फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

सेंट्रल जेल में तूलिका से जिंदगी में रंग भर रहे बंदी

Sat, 06 Feb 2016 02:09 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, आगरा
विज्ञापन
विज्ञापन
जेल की सलाखों के पीछे जिंदगी बेरंग और नीरस थी। मन निराशा के घोर अंधकार में घुट रहा था, मगर अब हाथों में तूलिका आते ही सब कुछ बदल गया है। खोए हुए रंगों ने एक बार फिर दस्तक दी। कागज पर अपनी कल्पनाओं को उड़ान देते बंदी अब मुस्कुराने लगे हैं। रचनात्मकता ने उन्हें जीने का संबल प्रदान किया है। उनका हुनर निखरकर सामने आ रहा है। ‘हम’ संस्था की पहल से सेंट्रल जेल के करीब सात बंदी पेंटिंग कर रहे हैं। ये सभी बंदी जेल में आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं।
विज्ञापन

सन् 2008 से जेल में बंद दिलीप की कला बहुत सुंदर है। वह पिछले दो महीने से पेंटिंग बना रहा है। उसने चित्रों में धूम्रपान के दुष्प्रभाव, जेल में कैदी से मिलने आई औरत, साईं बाबा, बच्चे पर ममत्व लुटाती मां आदि को दर्शाया है। इससे उसे सकारात्मक ऊर्जा मिली है। वह रंगोली भी बना लेता है। जेल जाने से पहले भी यही काम करता था।
पार्थो मुखर्जी स्केच बनाता है। उसे फीरोजाबाद जेल में प्रशस्ति पत्र भी मिल चुका है। वह तीन साल से यहां बंद है। उसने बाल गंगाधर तिलक, मदर टेरेसा के स्केच बनाए हैं। पार्थो कविता भी लिखता है।
विज्ञापन

सोनी ने जेल में ही पेंटिंग करना सीखा है। ‘हम’ संस्था द्वारा आयोजित वर्कशॉप में उसे इसके लिए प्रेरित किया गया। विजेंद्र 2010 से पेंटिंग कर रहा है। उसने भी जेल में यह कला सीखी। कहता है कि पहले डिप्रेशन में रहते थे, अब ध्यान बंट जाता है।
वृद्ध विजय रात भर जागकर पेन से विभिन्न तरह की डिजाइन बनाते हैं। एक पेंटिंग में चार घंटे लगते हैं। उन्होंने भी यहीं पर कला शुरू की।
अशोक भी स्केच बनाते हैं। कलाकारी करने से उसकी निराशा खत्म हो गई।
‘हम’ संस्था के विक्रम शुक्ला कहते हैं कि हमने जेल में आर्ट वर्कशॉप लगवाई, जिसमें कलाकार अश्विनी शर्मा ने कैदियों को तस्वीर बनाना सिखाया। उन्हें सामान भी उपलब्ध कराते हैं। हमारा उद्देश्य है कि कैदियों में सकारात्मक विचार आएं और अर्थिक रूप से मजबूत बनें। हमने तीन लोगों (पहले कैदी रहे) को स्थापित किया है। वे बाहर जाकर अपनी कला से अच्छा कमा रहे हैं।
वर्तिका नंदा ने भी दी है थीम
जेलर लाल रत्नाकर सिंह ने बताया कि सुदर्शन दुआ और ज्योति सिंह ने भी कैदियों को पेंटिंग करने के लिए प्रेरित किया। हमने व्यक्तिगत रूप से जेल सुधार विशेषज्ञ वर्तिका नंदा से इन कैदियों के बारे में बात की। उन्होंने कैदियों के लिए कविता भेजी है। उसी की थीम पर उन्हें जेल की दीवार पर चित्र बनाने हैं। यह दीवार एक आवाज है, उस पार ताज है, यहां है एकाकीपन फिर भी अब यही किसी मन का साज है...। इस कविता के आधार पर बंदियों को जेल की दीवार पर पेंटिंग करनी है।
बंटी को मिला तिनका-तिनका इंडिया अवार्ड
सेंट्रल जेल में साबुन से मूर्ति बनाने वाले बंटी की कला के सभी कायल हैं। हाल ही में उसे तिनका-तिनका इंडिया अवार्ड मिला है। इसकी संस्थापक वर्तिका नंदा है। बंटी ने साबुन से देवी देवताओं, भारत माता की मूर्ति बनाई हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें