मां का दूध बच्चे के लिए अमृतपान से कम नहीं है। इसके बाद भी महिलाएं भ्रांतियों के चलते अपने बच्चे को स्तनपान कराने से कतराती हैं। मां की बदलती सोच बच्चे के स्वास्थ्य पर असर डालती है।
चिकित्सक जन्म के बाद बच्चों को मां का दूध पिलवाते हैं। इसके बाद भी कम से कम छह माह तक बच्चे को मां का दूध पिलाने की सलाह देते हैं, लेकिन इस सलाह पर अमल नहीं हो पाता।
अधिकांश माताएं कुछ दिन बाद ही बच्चे को अपना दूध पिलाना बंद कर देती हैं। वे बच्चे को या तो बाजार का डिब्बा बंद दूध देना शुरू कर देती हैं या फिर गाय या भैंस के दूध से काम चलाती हैं।
स्तनपान के महत्व को देखते हुए प्रति वर्ष 1 अगस्त को विश्व स्तनपान दिवस का आयोजन किया जाता है। स्वास्थ्य विभाग भी कार्यक्रम चलाता है, लेकिन ये सब तारीखों और दिनों तक सिमट कर रह जाते हैं।