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ब्रज का बतरस: साहब के निकलते ही खाली करा दिए जाते हैं रास्ते, नेताजी ने दफ्तर पर ताला जड़ फुला लिया मुंह

Mon, 26 Oct 2026 08:17 PM IST
Arun Parashar संवाद न्यूज एजेंसी, आगरा

सार

ब्रज का बतरस काॅलम अब हर सोमवार को आप समाचार पत्र के साथ अमर उजाला डिजिटल पर भी पढ़ सकते हैं। ब्रज के बतरस में इस बार शामिल है नेताजी, साहब और राजनीतिक दल से जुड़े रोचक घटनाक्रम।
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ब्रज का बतरस। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
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कोपभवन में नेताजी
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ब्रज नगरी के एक नेताजी इन दिनों सुर्खियों में है। रिश्तेदारी के सियासी रसूख से पिछले दरवाजे से कुर्सी पा गए माननीय को अब कायदे-कानून से ऊपर सुपर पॉवर चाहिए। जमीनों के वारे-न्यारे करने और रेवड़ी बांटने की छूट नहीं मिली तो हुजूर सीधे कोपभवन में जा विराजे हैं। शहर का विकास ठप है, पर जनता के दर्द से बेपरवाह नेताजी कभी इस्तीफा तो कभी बेबसी का राग अलाप रहे हैं। दफ्तर पर ताला जड़कर मुंह फुला लिया है। नेताजी के इस हठ योग से तंग आकर अब महकमे ने भी शासन से वैकल्पिक बंदोबस्त की गुहार लगा दी है।

नंगे पांव संतुलन
ताजनगरी के एक साहब इन दिनों दोधारी तलवार पर नंगे पांव संतुलन साधने की कठिन कला सीख रहे हैं। एमएलसी के दंगल में स्थानीय क्षत्रपों की खुलकर मदद करें, तो दिल्ली वाले करीबी की सुपरग्रिड झुलसने का अंदेशा है और अगर चुनावी दांव-पेच से कन्नी काटते हैं तो लखनऊ वाली हाईटेंशन लाइन से जोरदार करंट लगने का पूरा खतरा है। दिल्ली कनेक्शन और अपनी साख सलामत रखने के लिए साहब ने पासा तो फेंक दिया है, पर दांव कितना सही बैठेगा, यह वक्त बताएगा।
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कागजी अर्जुन
चार साल तक अनुशासन की घुट्टी पीकर बैठे फूल छाप सेवक आज दो पाटों के बीच पिसकर हलकान हैं। न सदन की चौखट नसीब हुई, न मैडम ने सुध ली। अफसरों की बेरुखी के बीच शहर की नालियां पहले ही ''वेनिस'' बन चुकी हैं। अब चुनावी बिगुल बजते ही ये शूरवीर कुरुक्षेत्र में उतरने के बजाय जनता के जहर बुझे तीरों से मुंह छिपाते फिर रहे हैं। भविष्य दांव पर है और दिल में हूक उठ रही है, पर समझ नहीं आ रहा कि बगावत का मोर्चा खोलें या मुंह पर टेप चिपकाकर खुद को बचाएं।
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जलवेदार साहब
ताजनगरी में एक साहब के खूब जलवे हैं, जिसकी चर्चा भी खूब हो रही है। लखनऊ की ब्यूरोक्रेसी से लेकर सियासत तक में कानाफूसी चल रही है। सिस्टम से कनेक्शन ठीक है। इसलिए कोई बोल नहीं पा रहा। साहब के शहर में निकलते ही काफिला चल पड़ता है। ट्रैफिक खाली करा दिया जाता है। उनके लिए जनता को जाम में रोक दिया जाता है। मातहतों की वफादारी देखिए कि जिस घराने के नाम पर ऐतिहासिक आयोजन था, उसी परिवार के सदस्य को चौखट पर रोक दिया गया। मगर मजाल क्या कि कोई चूं भी कर सके। दो दिन बाद उसी जलसे में आम अवाम का पहिया थामकर साहब की कार को ग्रीन सिग्नल दिया गया। हर जगह बात हो रही है कि सत्ता की हनक हो तो ऐसी।







 
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