भगवा सुनामी में सबसे जोर का झटका बसपा को लगा। दलितों की राजधानी में बसपा अध्यक्ष मायावती अपने चुनाव अभियान का श्रीगणेश करती रही हैं। बदले में आगरा भी दो बार से नौ में से छह विधायक यानी दो तिहाई बसपा विधायक जिताता रहा, लेकिन दलितों के इस दुर्ग में साल 2014 में भाजपा ने ऐसी सेंध लगाई कि विधानसभा चुनाव तक आते-आते दलितों का दुर्ग पूरी तरह से ढह गया। पिछले 25 सालों में यह पहला मौका है, जब आगरा में बसपा का खाता ही नहीं खुल पाया।
2012 के मुकाबले 2017 में बसपा छह सीटों पर पुराने वोट भी नहीं पा सकी। छावनी, ग्रामीण, फतेहपुर सीकरी, खेरागढ़, फतेहाबाद और बाह में बसपा प्रत्याशी पुराने आंकड़े को छू भी न सके। पांच साल में जिले में तीन लाख वोट बढ़े, लेकिन बसपा के वोट बढ़ने के उलट कम हो गए। फतेहाबाद में बसपा प्रत्याशी अपने ही 38 हजार, खेरागढ़ में 8 हजार, बाह में 15 हजार, सीकरी में 13 हजार, ग्रामीण में 5 हजार वोट और खो बैठे। एत्मादपुर में ही बसपा 11 हजार वोट बढ़ा सकी। बसपा के 6 में से चार विधायक हैटट्रिक नहीं कर पाए और दो पूर्व विधायक फिर से लखनऊ नहीं पहुंच सके। साल 2012 में बसपा को जिले भर में कुल 5.96 लाख वोट मिले थे, लेकिन दो साल बाद लोकसभा चुनाव में 2014 में यह महज 5.09 लाख ही रह गए। सोशल इंजीनियरिंग के तहत बसपा ने तीन ब्राह्मण आगरा से उतारे, लेकिन पार्टी सभी 9 सीटों पर 5.38 लाख वोट ही पा सकी।
मुस्लिमों को रिझा न सकी बसपा
बसपा ने पूर्व विधायक भुट्टो को दक्षिण से उतारा और पूर्व मंत्री बशीर को भी शामिल कराया, लेकिन मुस्लिम वोट फिर भी न पा सकी। दक्षिण में लोकसभा चुनाव में बसपा प्रत्याशी रहे नारायण सिंह सुमन को मुस्लिमों का समर्थन मिला था, तब वह 69198 वोट ला पाए, लेकिन मुस्लिम प्रत्याशी भुट्टो केवल 57657 पर ही सिमट गए।
।वोटिंग मशीन में चिप लगाकर भाजपा ने बेईमानी कराई है। अगर बैलट पेपर से चुनाव हो जाए तो हम जीत जाएंगे। हमारा बेस वोट बढ़ा है, लेकिन मशीन कम बता रही है। गुजरात से आई मशीनों, उनके इंजीनियरों की जांच होनी चाहिए।
- आजाद सिंह, बसपा जोन कार्डिनेटर