पूरे देश में पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव के नतीजों की चर्चा है। कोलकाता एकबार फिर राजनीति के केंद्र में है। 400 साल पहले मुगल काल में एक दौर ऐसा भी था, जब बंगाल की सत्ता का हर फैसला आगरा किले से तय होता था। वर्ष 1576 में बंगाल विजय के बाद आगरा किले के दीवान-ए-खास से ही बंगाल के सूबेदार (गवर्नर) के नाम का फरमान जारी किया जाता था।
मुगल बादशाह अकबर से लेकर औरंगजेब तक बंगाल की सत्ता की डोर आगरा किले से ही खींची जाती रही। मुगल साम्राज्य के लिए बंगाल केवल एक प्रांत नहीं, बल्कि जन्नत-उल-बिलाद यानी देशों का स्वर्ग था, जिसकी धन-संपदा और सामरिक स्थिति पर मुगल बादशाह हमेशा नजर बनाए रखते थे। बादशाह अकबर ने जब 1576 में दाऊद खान कर्रानी को हराकर बंगाल पर विजय प्राप्त की, तब से यह प्रांत सीधे तौर पर आगरा के अधीन आ गया।
उसके बाद पूरे मुगल काल में आगरा किले के दीवान-ए-खास में ही पूरे साम्राज्य के गवर्नर तय कर फरमान जारी किए जाते थे। मुगल इतिहासकार और पुरातत्वविद डॉ. आरके दीक्षित के मुताबिक बंगाल में जब विद्रोह हुआ तो उसे दबाने के लिए आगरा से ही शाही फौज कूच करने के लिए निकली थी। मुगल बादशाह जहांगीर ने अपने अभिन्न मित्र मिर्जा अजीज कोका को वर्ष 1606 में बंगाल का गवर्नर बनाकर भेजा था।
मुगलों ने बंगाल को दी अहमियत
पद्मश्री से सम्मानित पुरातत्वविद और मुगल इतिहास के जानकार केेके मुहम्मद के मुताबिक मुगल बादशाह अकबर ने दाऊद खान को हराकर बंगाल को मुगल सूबा घोषित किया। यहां आगरा से केंद्रीकृत प्रशासन चलाया गया। उसके बाद जहांगीर ने बंगाल से ही समुद्री डाकुओं पर लगाम लगाई। शाहजहां के काल में हुगली से पुर्तगालियों को खदेड़ने का फरमान हुआ और बंगाल के व्यापार पर मुगलों का पूरा नियंत्रण हो गया।
बंगाल में सूबेदार के रूप में तब राजा मान सिंह, मुनीम खान, इस्लाम खान, शहजादा खुर्रम, शुजा, कासिम खान, शाइस्ता खान, मुर्शिद कुली खान आदि रहे। वर्ष 1576 से बंगाल पर शुरू हुआ मुगलों का नियंत्रण वर्ष 1717 में मुगल बादशाह फर्रुखसियर तक चला, जिन्होंने मुर्शिद कुली खान को सूबेदार नियुक्त किया। वे बंगाल के पहले नवाब बने।