मैनपुरी। भाजपा को मैनपुरी लोकसभा सीट पर हमेशा जीत की आस रही है। दूसरे दलों से आने वाले प्रत्याशियों पर दांव लगाया गया, लेकिन चुनाव लड़ने के बाद वे भाजपा का दामन छोड़कर चले गए।
मैनपुरी फतह के लिए भाजपा ने कई बार सपा और अन्य पार्टियों से उनका साथ देने आए लोगों को लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी बनाया। वो चुनाव हारने के बाद भाजपा का दामन छोड़कर दूसरे दलों में चले गए। कुछ तो ऐसे रहे कि फिर वे जनपद में ही वापस नहीं लौटे। लोकसभा क्षेत्र में उतारे गए प्रत्याशियों पर नजर डालें तो सपा से पाला बदलकर आए उपदेश सिंह चौहान को वर्ष 1996 के चुनाव में भाजपा ने अपना प्रत्याशी बनाया। कार्यकर्ताओं ने उन्हें सिर आंखों पर बैठाया। चुनाव के बाद ही उनका भाजपा से मोह भंग हो गया और अगला चुनाव उन्होंने बसपा से लड़ा।
1998 में मुलायम सिंह के खास रहे अशोक यादव ने सपा छोड़कर भाजपा का दामन थामा। भाजपा ने मैनपुरी में उन्हें लोकसभा प्रत्याशी बना दिया। बाद में वह भी भाजपा छोड़ गए। 1999 कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने वाले दर्शन सिंह यादव पर भाजपा ने दांव लगाया लेकिन हारने के बाद वो भी सपा में चले गए।
वर्ष 2004 में सपा ने बलराम सिंह यादव का टिकट काटा तो वो भाजपा में शामिल हुए। मैनपुरी लोकसभा से भाजपा ने उन्हें प्रत्याशी बनाया। चुनाव हारने के बाद वे भी भाजपा कार्यकर्ताओं को निराश कर गए। संवाद
इन्होंने भी की बगावत
जनपद के भोगांव विधानसभा से 1997 में प्रत्याशी रहीं कृष्णादास लोधी, 2002 में प्रत्याशी रहे अभिलाख सिंह राजपूत, 2007 में प्रत्याशी रहीं रश्मि राजपूत भी भाजपा का साथ छोड़कर सपा के पाले में बैठी हुई हैं। करहल विधानसभा से भाजपा से उम्मीदवार रहे सुभाष चंद्र यादव, सोबरन सिंह यादव, अनिल यादव को भी भाजपा रास नहीं आई और बाद में ये सब सपाई हो गए।