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सपना आसमान छूने का, जमीन उपेक्षित

Mon, 07 Dec 2015 02:03 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला आगरा
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मील का पत्थर साबित हो, इस कामना के साथ चंबल सेंक्च्युरी में आयोजित तीन दिवसीय बर्ड फेस्टिवल का रविवार को सम्पन्न हो गया। चंबल की यह जमीन लेकिन ठगी सी रह गई। यहां जुटे विशेषज्ञ और पक्षी प्रेमी घड़ियाल सेंक्च्युरी में चिड़ियों को तलाशते रहे जबकि दूसरी ओर कीठम का पक्षी विहार कलरव से गुंजायमान था। औपचारिक समापन बर्ड फेयर के जनक टिम अपलेटन ने किया। घोषणा की गई कि अगला बर्ड फेस्टिवल वर्ष 2016 में दो से चार दिसंबर तक होगा।
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फिक्की (फेडरेशन ऑफ इंडियन चेंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज) और वन विभाग के इस आयोजन में बर्ड लाइफ इंटरनेशनल को अपने बर्ड फेस्टिवल के विस्तार का अवसर जरूर मिला। शनिवार को एमओयू भी साइन हुआ मगर, चंबल के लोग तीन दिन के इस आयोजन में उपेक्षित ही रहे। रविवार शाम समापन समारोह में अपर प्रबंध निदेशक वन एवं ईको टूरिज्म के यूपी प्रभारी आरके सिंह ने कहा कि विशेषज्ञों ने पक्षी संरक्षण पर जो रिपोर्ट तैयार हुई है, सरकार को दी जाएगी। इससे रोजगार के अवसर सृजित होंगे और क्षेत्र से लोगों का पलायन रोकने में मदद मिलेगी। पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा।
पक्षी विज्ञानी टिम अपलेटन ने कहा कि चिड़ियों को बचाने में यह आयोजन मील का पत्थर साबित होगा। चंबल सफारी के डायरेक्टर आरपी सिंह ने कहा कि चंबल में पर्यटन को नई पहचान मिलेगी। यूके से आए केएन बारबर ने कहा कि दुनिया में बर्ड फेस्टिवल के 2.50 लाख सदस्य हैं जो बर्ड स्टेटस पर नजर रखते हैं। लखनऊ की अमृता कनौजिया, पवन बारु ने भी विचार व्यक्त किए। इससे पहले सुबह विशेषज्ञों समेत सरकारी अमला बर्ड वाचिंग के लिए चंबल सेंक्च्युरी के नंदगवां घाट पहुंचा। चंबल नदी में मोटर बोट से सैर कर की। घड़ियाल और डाल्फिन देखे। दोपहर में चिड़ियों के संरक्षण पर मंथन कर रिपोर्ट तैयार किया गया।
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बच्चों के लिए कम पड़ गई टोपियां
पर्यावरण शिक्षण केंद्र, लखनऊ की प्रतियोगिताओं के विजेताओं को पुरस्कार और प्रमाणपत्र बांटे गए। इस दौरान टोपियां कम पड़ गईं। अपर प्रबंध निदेशक वन आरके सिंह ने कहा कि टोपी स्कूलों में भेज दी जाएगी। रविवार को नवीन सरस्वती ज्ञान मंदिर सिकंदरा, प्रताप पब्लिक स्कूल आगरा, सेंट मारिया स्कूल, उदी, इटावा के छात्र-छात्राओं ने निबंध-पोस्टर प्रतियोगिता और प्रश्नोत्तरी में भाग लिया।

जाकौ बटेसुर, ताई कौ ठौर नाहि
जरार के लोगों के मुताबिक इस फेस्टिवल से उन्हें परेशानी के सिवा कुछ न मिला। दुकानों के टिनशेड उतरवाए तो सड़क किनारे लगे हथठेल भी हटवा दिए गए। फेस्टिवल देखना भी नसीब न हुआ। अजयपाल सिंह, राजीव कुमार, राजू गुप्ता, विजेन्द्र सिंह, राम प्रकाश आदि ने प्रवेश के लिए पास के नाम पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ‘जाकौ बटेसुर ताई कौ ठौर नाहि।’

चंबल को रामसर साइट का दर्जा दिलाने के प्रयास भी
बाह। नेशनल चंबल सेंक्च्युरी को प्रदेश की दूसरी रामसर साइट बनाने के भी प्रयास हो रहे हैं। प्रस्ताव सरकार के पास विचाराधीन है। नरौरा में प्रदेश की पहली रामसर साइट कार्य कर रही है। देश-विदेशी के पक्षियों और जीवों की संरक्षण के लिए यह साइट घोषित किया जाता है। टर्टल सर्वाइवल एलायंस (टीएसए) की देखरेख में नरौरा साइट पर काम हो रहा है। बृज घाट से नरौरा तक टर्टल सेंक्च्युरी घोषित ही है, अब प्रवासी पक्षियों के संरक्षण के प्यास भी शुरू कर दिए गए हैं। फोकस इन पक्षियों के हैबीटेट और ब्रीडिंग पर है। यह जानकारी टीएसए के प्रोजेक्ट मैनेजर नीरज कुमार पाल और सीनियर प्रोजेक्ट आफिसर स्नेहा धारवडकर ने अमर उजाला को दी। बताया कि चंबल की घड़ियाल सेंक्च्युरी के रामसर साइट  घोषित होने पर यहां भी कछुओं और प्रवासी पक्षियों का संरक्षण हो सकेगा। 
 
क्या है रामसर साइट
2 फरवरी 1971 मेें ईरान के रामसर शहर में लुप्त होते वेटलैंड और संकट में पड़ी चिड़ियों को बचाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय कांफ्रेंस हुई थी। इसमें पक्षियों के संरक्षण और वेटलैंड के विकास पर भारत समेत कई देशों के हस्ताक्षर से घोषणा पत्र जारी किया गया था। इसमें कहा गया था कि जहां भी संभावना हो पक्षियों को बचाने के लिए रामसर साइट घोषित की जाए। यूपी में नरौरा को पहली साइट बनी थी। इसी के तहत 2 फरवरी को वर्ल्ड वेटलैंड डे मनाया जाता है।
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