मुगलिया राजधानी रहे आगरा की धरोहरों पर इन दिनों संकट छाया है। चार धरोहरें बीते तीन माह में ध्वस्त हो चुकी हैं। संरक्षित स्मारकों के आसपास ढाई हजार से ज्यादा अवैध निर्माण हो चुके हैं। दीवानी स्थित झुनझुन कटोरा भी चारों ओर से अवैध निर्माण से घिरा है। अवैध निर्माणों की सूची सूचना के अधिकार में जारी की गई है, मगर एक पर भी कार्रवाई नहीं की गई है।
10 अवैध निर्माण हैं
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से सूचना के अधिकार में मिली जानकारी के मुताबिक संरक्षित स्मारक झुनझुन कटोरा के पास 10 अवैध निर्माण हैं। इन सभी में एएसआई की ओर से संबंधित थाने में एफआईआर कराई गई है। अवैध निर्माण की सूची में सूर्य नगर, दीवानी चौराहे पर हुए निर्माण शामिल हैं जो स्मारक के विनियमित दायरे में किए गए हैं।
इन्होंने किया है निर्माण
इस सूची में 32 सूर्य नगर निवासी सुशील चौहान, सिविल लाइंस के संदीप ढल, दीवानी चौराहा स्थित लोटस हॉस्पिटल के कमल चौधरी, दीवानी पर ही जगदीश अरोड़ा, बैंक कॉलोनी के हरिशंकर शर्मा, 11, बैंक कॉलोनी निवासी सुनील अग्रवाल, संजय नगर के जायल अली, दीवानी चौराहे पर राजीव, 80 सूर्य नगर निवासी भसीन और 85 सूर्य नगर निवासी अमित जुनेजा शामिल हैं।
एडीए को करनी है कार्रवाई
एएसआई अधीक्षण पुरातत्वविद डॉ. राजकुमार पटेल के मुताबिक विभाग ने एफआईआर के बाद एडीए और प्रशासन को सूची सौंप दी है। अवैध निर्माण पर अब कार्रवाई उन्हें करनी है। एएसआई अपनी ओर से प्रक्रिया पूरी कर चुका है।
झुनझुन कटोरा का इतिहास
झुनझुन कटोरा में आगरा के प्रसिद्ध संत मौलाना हसन की कब्र है। फारस के मूल निवासी मौलाना हसन सिकंदर लोदी से लेकर सलीम शाह सूर के शासनकाल के दौरान आगरा में रहे। वह मीर रफी-उद-दीन के शिष्य बन गए, जिन्होंने उन्हें इस्लामी धर्मशास्त्र पढ़ाया। सलीम शाह सूर के शासनकाल में 1546 ई. में मौलाना हसन की मृत्यु हुई। उनका स्मारक ही झुनझुन कटोरा के नाम से चर्चित है।
चित्रकारी भी हो रखी है
यह अष्टकोणीय है और ईंट, चूने से बना हुआ है। ईंटों का आकार मुगल इमारतों से अलग है। बड़ा गुंबद और तीन केंद्र वाले मेहराब इसमें है। कहीं कहीं इसमें चित्रकारी है, जबकि आलों के ऊपर चौड़ी पट्टी है, जिस पर इबारत लिखी गई है। इसी में दर्ज है कि यह स्मारक मौलाना हसन का है। हालांकि इससे जुड़ी कहानी में इसे निजाम भिश्ती का मकबरा बताया जाता है, जिसने शेरशाह सूरी के साथ युद्ध में हुमायूं को उनका घोड़ा मर जाने के बाद अपने मशक से नदी पार कराया था, लेकिन एएसआई इस कहानी को मान्यता नहीं देता।