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भूख मिट जाए, इन ‘छोटू’ का तो यही ‘सपना’

Sun, 12 Jun 2016 01:09 AM IST
अमर उजाला आगरा
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भूख मिट जाए, इन ‘छोटू’ का तो यही ‘सपना’ - फोटो : Amar Ujala
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बाल श्रम निषेध दिवस पर विशेष: 
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मजदूरी कर रहे बच्चे चाहकर भी नहीं पढ़-लिख पाते
गरीबी के चलते कंधों पर उठा लिया अपनों का बोझ

बड़े होकर क्या बनोगे... झट से डाक्टर, इंजीनियर, पुलिस, सिपाही, खिलाड़ी जैसे जवाब। छोटी उम्र में अधिकांश बच्चों के  ऐसे ही सपने होते हैं। मजदूरी करने को मजबूर हजारों ऐसे ‘छोटू’ भी हैं, जिनके सपने इनसे जुदा हैं। परिवार की आर्थिक तंगी और सामाजिक परिस्थितियां ऐसी बनी कि भूख मिट जाए, इनका यही सपना बनकर रह गया। 12 जून को बाल श्रम निषेध दिवस जरूर है, लेकिन गली-नुक्कड़, घर, रेस्टोरेंट ऐसे तमाम जगहों पर ‘बचपन’ मजदूरी करते हुए मिलेगा। कहीं गरीबी तो कहीं परिवार के मुखिया का गुजर जाना, ऐसे हालात आए तो ये बालवीर अपनों का बोझ उठाने सबसे आगे आए। 
संजय प्लेस में अंडे की धकेल पर कार्य करता छोटू, जो अपना सही नाम भी लगभग भूल गया है। जब उससे बात की तो बोला कि साहिल नाम है, पिता की मौत हो गई, मां घरों में झाड़ू पोंछा लगाती हैं। भाई-बहन हैं, सभी कमाते हैं, तभी पेट भर पाता है। उससे पढ़ने का पूछा तो बोला, भइया पढ़ना कौन नहीं चाहता ... लेकिन हालात पढ़ने दें तब तो पढ़ें। 
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हरीपर्वत चौराहे के पास ढाबे पर मनीष काम करता है। पूछने पर पता चला कि वह इटावा का है, बताया कि गरीबी ऐसी कि पढ़ाई छूट गई। बड़े सपने देखे, लेकिन अब तो बस भूख ही मिट जाए ...। लगभग कामकाज को मजबूर हरेक बच्चों की ऐसी ही दास्तां रहीं। 

काम पूरा, दाम आधा
बच्चों से श्रम कराने वाले इनका आर्थिक शोषण करने से भी बाज नहीं आते। इनसे 12-16 घंटे तक काम लिया जाता है। मेहनताना चंद सौ रुपये ही। रेस्टोरेंट, ढाबे पर तो सुबह-शाम के खाना खिलाकर ही इनसे काम लिया जाता है। 

श्रम विभाग ने पकड़े थे 87 बाल मजदूर
श्रम विभाग ने बीते साल 87 बाल मजदूर पकडे़, इनमें से 45 बच्चों को नजदीकी प्राइमरी स्कूल में प्रवेश दिलाया। ये 45 बच्चे फिर से रेस्टोरेंट, ढाबे, कारखाने में कार्य करते हुए मिले। 
सजा किसी को नहीं
बाल श्रम अधिनियम 1986 के तहत 14 साल तक के बच्चों से श्रम कराने पर सजा और दंड का प्रावधान है। इसमें 10-20 हजार रुपये का आर्थिक दंड और एक वर्ष तक की सजा हो सकती है। सजा कितने लोगों को मिलती है, इसका अंदाजा इस बात से लगता है कि बाल मजदूर अधिकतर बाजारों, नुक्कड़ों पर काम करते हुए दिख जाते हैं।
 
हीनभावना के होते शिकार
वरिष्ठ मनोरोग चिकित्सक डा. केसी गुरनानी बताते हैं कि कामकाजी बच्चे औरों को खेलते-कूदते और पढ़ते-लिखते देखते हैं तो वो हीनभावना के शिकार होते हैं। बड़े होने पर इनमें खुद, फिर समाज को नुकसान पहुंचाने की सोच ज्यादा विकसित होती है। जरूरी है कि अभिभावक खुद संघर्ष कर इनको शिक्षित करें, अब तो नि:शुल्क पढ़ाई तक की व्यवस्था है। 
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चाइल्ड लाइन ने जागरूकता रैली निकाली 
अंतरराष्ट्रीय बाल श्रम निषेध दिवस 12 जून को मनाया जाता है। इसके एक दिन पूर्व चाइल्ड लाइन ने शनिवार को एक जागरूकता रैली निकाली, जिसमें 40 बच्चों ने भाग लिया। लोगों को बाल श्रम रोकने के लिए जागरूक किया गया। चाइल्ड लाइन कोआर्डिनेटर नरेंद्र परिहार ने कहा कि साक्षरता की कमी और परिवार की गरीबी के कारण बच्चों को काम करना पड़ता है। इस दौरान बढ़ते कदम की जिला अध्यक्ष पूनम, डा. भीमराव अंबेडकर पूर्व माध्यमिक विद्यालय के अध्यक्ष गया प्रसाद, इंस्पेक्टर पूरन सिंह मेहरा, चाइल्ड लाइन सदस्य असलम खान, अमित, रितु वर्मा आदि मौजूद रहीं। 
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