ग्रामीण क्षेत्र में आज भी कई लोगों की सोच ऐसी है कि बेटी पराया धन है, ज्यादा पढ़ा-लिखाकर क्या करना है, लेकिन यह गलत है। इसे बेटियों ने ही गलत साबित किया है। कोई मेहनत के दम पर अफसर बनी है तो किसी ने महिलाओं का उत्पीड़न देखकर पुलिस की नौकरी चुनी है। जिंदगी में मुकाम हासिल करने के लिए मजदूरी तक की है।
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ठान लिया था, अफसर बनकर दिखाना है- शिखा गुप्ता
फतेहाबाद की रहने वाली वाणिज्य कर अधिकारी शिखा गुप्ता ने बताया कि लड़कियां पराया धन होती हैं... इन्हें ज्यादा नहीं पढ़ाना चाहिए, बचपन में इन शब्दों को सुनकर ठान लिया कि कुछ करके दिखाना है। फतेहाबाद के भगवान देवी कन्या इंटर कॉलेज के बाद आगरा के बैकुंठी देवी कन्या महविद्यालय से बीए किया। वर्ष 2013 में समीक्षा अधिकारी और सीडीपीओ पद पर चयन हुआ।
लखनऊ में समीक्षा अधिकारी के पद पर ज्वाइन किया। फिर पीसीएस की परीक्षा दी। 2015 में वाणिज्य कर अधिकारी के पद पर चयनित हो गई। वर्तमान में तैनाती गाजियाबाद में है। मुझे ग्रामीण परिवेश से आने के कारण अंग्रेजी में परेशानी हुई। घर से दूर आगरा तक जाकर पढ़ाई करना चुनौतीपूर्ण था। आसपास के लोगों के साथ रिश्तेदारों ने भी बाहर जाकर पढ़ाई करने पर सवाल खड़े किए लेकिन जो ठान लिया, वह करके दिखाया।
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महिलाओं का उत्पीड़न देख चुनी पुलिस की नौकरी- प्रियंका सिंह
दरोगा प्रियंका सिंह एत्मादपुर क्षेत्र के गांव ओंकरपुर की रहने वाली हैं। वो बताती हैं कि इस मुकाम तक पहुंचने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। गांव से पांच किमी दूर साइकिल से पढ़ने जाती थी। पहले लेखपाल की नौकरी मिली, इसके बाद प्रशासन में एक और जॉब। पिता किसान हैं। ताऊजी ग्राम प्रधान थे। घर पर आसपास की पीड़ित महिलाएं आती थीं। उन पर हो रहे उत्पीड़न को देख पुलिस अधिकारी बनने की ठानी। मेहनत की, पुलिस की नौकरी करने के लिए सुबह उठकर दौड़ लगाती थी। अब पुलिस में उपनिरीक्षक की ट्रेनिंग खत्म हुई है। महिलाओं के हक में सेवा कार्य करूंगी।
भाइयों की परवरिश के लिए शादी नहीं की- शशिबाला
फतेहपुर सीकरी की शशिबाला ने बताया कि वो गांव कोलीखाना की रहने वाली हैं। पिता की मृत्यु वर्ष 1976 में हो गई थी। दो बरस बाद मां भी चल बसीं। तब मेरी उम्र 13 साल थी, दसवीं कर रही थी। दो छोटे भाइयों गुड्डू रावत व कृष्ण चंद्र रावत को पालने की जिम्मेदारी आ पड़ी। 12वीं में पढ़ाई के दौरान ही आंगनबाड़ी में नौकरी की। सुबह उठकर भाइयों को तैयार कर स्कूल छोड़ना फिर नौकरी पर जाना। काफी संघर्ष के बाद पिता के स्थान पर मृतक आश्रित में शिक्षिका की नौकरी मिली। दोनों भाइयों के लिए विद्यालय खुलवाया, उनकी शादी की लेकिन अपनी शादी की नहीं सोची। जीवनभर शादी नहीं करने का फैसला ले लिया।
अछनेरा की ममतेश पालीवाल बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग में सुपरवाइजर हैं। उन्होंने बताया कि चार बहन और एक भाई के साथ पूरे संयुक्त परिवार की जिम्मेदारी पिताजी पर थी। पिताजी की तनख्वाह गृहस्थी के कार्यों में ही निकल जाती थी। ऐसे में अच्छे स्कूल में पढ़ाई के बारे में क्या सोचते। कई किलोमीटर दूर स्कूल था। पहले घर पर ही रहकर स्वाध्याय किया। बाद में पैदल चलकर स्कूल जाने लगी। प्रतियोगी परीक्षाएं देती रही। कठिनाइयों में भी पीछे नहीं हटी, नौकरी मिली। अब सब ठीक है।
मजदूरी पाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ा- ऊषा शर्मा
फतेहपुर सीकरी नगर पालिका में ऊषा शर्मा सभासद हैं। 22 वर्ष पूर्व उनके पति दीनदयाल का स्वर्गवास हो गया था। तब बेटी की परवरिश के लिए दरी चिंदी के गोदामों में मजदूरी की। उन्होंने बताया कि गोदामों में मजदूरी मिलना भी आसान नहीं था। कई गोदामों के चक्कर काटती थी, किसी दिन काम मिलता ही नहीं था। काम मिलता तो मजदूरी नहीं मिलती थी। मजदूरी के साथ ही आम लोगों की समस्याओं राशन कार्ड, पेंशन आदि के निस्तारण के लिए संघर्ष किया। लोगों की सहायता की। 2017 में पालिका बोर्ड के हुए चुनाव में इस्लामगंज वार्ड से सभासद चुन ली गईं। महिलाओं की सहायता करती रहूंगी।