धरती पर डाक्टर भगवान का रूप हैं। 35 साल के अमित ने यही पढ़ा-सुना था।
एसएन मेडिकल कालेज की चौखट पर आकर उसका यह विश्वास टूट गया। वह यहां घड़ी
वाली बिल्डिंग की सीढ़ियों पर 10 दिन से बीमार हाल, लाचार पड़ा है। इलाज के
लिए जिस डाक्टर को देखा गुहार लगाई, पर किसी का दिल नहीं पसीजा। हालत अब
ऐसी है कि जुबां से बोल भी बमुश्किल फूट रहे।
11 दिन पहले की बात है।
विजय नगर निवासी अमित के पैराें में तेज दर्द हुआ। खड़ा होना दूभर।
जैसे-तैसे वह देर शाम इमरजेंसी पहुुंचा। कुछ दवा देकर उसी रात 11 बजे अमित
से वार्ड खाली करा लिया गया। हालत खराब थी लेकिन कहा गया कि घड़ी वाली
बिल्डिंग में शिफ्ट कर देंगे। वहां इलाज होगा। एंबुलेंस स्टाफ एक कदम आगे
निकला। अकेले अमित को गेट पर ही छोड़ दिया। वह वार्ड तक छोड़ने को
गिड़गिड़ाता ही रह गया। थक हार कर सोचा, चंद घंटे की बात है, सुबह कोई उसे
वार्ड में शिफ्ट करा ही देगा। दस दिन से उसकी यह उम्मीद पूरी नहीं हुई।
लापरवाही की हद देखिए, डाक्टर तक देखकर आगे बढ़ जाते। उसकी हालत बिगड़ती जा
रही है। शरीर पीला पड़ चुका है। घाव हुआ। अब तो कीड़े पड़ने लगे हैं। सांस
लेने में भी तकलीफ है। अमित ने बताया कि कुछ डाक्टरों ने तो यह कह दिया कि
ऊपर चढ़ने में दिक्कत होगी, यहीं पड़े रहो।
बजट धांधली की जांच अभी अधूरी
गरीब
और असहाय मरीजों के इलाज को प्रदेश सरकार ने कालेज के आम बजट से अलग 50
लाख रुपये दिए। खेल कुछ ऐसा कि बजट खत्म हो गया और पर्याप्त संख्या में
गरीबों को इसका लाभ भी नहीं मिला। ‘अमर उजाला’ ने जब इस धांधली को उजागर
किया तो जांच शुरू हुई। तीन महीने हो गए, जांच पूरी नहीं हुई है।
खून के रिश्ते भी पड़े कमजोर
अमित
ने बताया कि पहले पिता विनोद बिहारी ने दम तोड़ा कुछ साल बाद मां ने।
दोनों बड़े भाइयों ने भी अमित से दूरी बना ली। दोनों भाइयों आर्थिक स्थिति
अच्छी है, कई बार फोन कर अपनी दशा भी बताई, लेकिन कोई नहीं आया।
कैसा
भी मरीज हो, उसके उपचार के निर्देश हैं। अमित को भर्ती कर उसका इलाज कराया
जाएगा। उसे भर्ती न जांच होगी वाले स्टाफ की जांच भी कराई जाएगी। डा. अजय
अग्रवाल, प्राचार्य