फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

स्थापना दिवस विशेष: आजाद भारत के पहले चुनाव से आज तक...लोकतंत्र के हर महापर्व का साक्षी रहा अमर उजाला

Thu, 18 Apr 2024 11:15 AM IST
धीरेन्द्र सिंह संजीव सिंह/ अशोक सिंह, आगरा

सार

अमर उजाला की 76 साल की यात्रा, पत्रकारिता, प्रकाशन की दुनिया का शिलालेख है। लेखाजोखा है सामाजिक और राजनीतिक बदलावों का। इस समय यात्रा में आप भाषा-बोली में आए अंतर, शब्दों के प्रयोग में परिवर्तन से भी रू-ब-रू होते हैं। हम भारत में लोकतंत्र के हर महापर्व के साक्षी रहे हैं, चाहे वह स्वतंत्रता मिलने के बाद 1951-52 में हुए पहले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का चौतरफा विजय मार्च हो, 1977 में पहली गैर कांग्रेस सरकार का केंद्र में आना हो... या 2019 के चुनाव में 'प्रचंड मोदी'। सात दशक से अधिक की अद्भुत और अनवरत यात्रा आपके समक्ष प्रस्तुत है... 
विज्ञापन
अमर उजाला स्थापना दिवस विशेष - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

अमर उजाला आजाद भारत के पहले चुनाव से लेकर आज तक दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के महापर्व का साक्षी है। देश में 1951-52 से लेकर 2019 तक हुए आम चुनाव में बहुत कुछ बदल गया है। पाठकों ने चुनावी प्रबंध और तकनीक में भी बदलाव देखा। लोहे की मतपेटियों के युग से लेकर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन ( ईवीएम)  तक का रास्ता तय किया। पहले चुनाव में 17.3 करोड़ मतदाता थे, 2019 के आम चुनावों में मतदाताओं की संख्या बढ़कर 91.19 करोड़ पहुंच गई है, जिसमें 67.4 प्रतिशत का रिकॉर्ड मतदान हुआ। भारतीय सियासत में 1952 से 2004 तक नेहरू, इंदिरा और अटल काल रहा। 2014 से मोदी युग शुरू हुआ।
विज्ञापन

स्वतंत्रता के कुछ वर्षों के अंदर ही पहले आम चुनाव हुए। वयस्क मताधिकार के आधार पर आम चुनाव का फैसला लिया गया। 1950 में पूर्व नौकरशाह सुकुमार सेन पहले मुख्य चुनाव आयुक्त बने। पहले आम चुनाव में करीब 17 करोड़ लोगों ने भाग लिया था जिसमें 85 फ़ीसदी लोग अनपढ़ थे। करीब 4500 सीटों ( लोकसभा और विधानसभा मिलाकर) के लिए चुनाव हुआ था जिसमें 499 सीटें लोकसभा की थीं। देश में  2 लाख 24 हज़ार मतदान केंद्र बनाए गए थे। लोहे की 20 लाख मतपेटियां बनाई गई थीं जिसके लिए 8200 टन इस्पात का इस्तेमाल किया। चुनाव कराने के लिए कर्मचारी संविदा पर भी रखे गए थे।
 

महिलाओं में घूंघट का प्रचलन था। महिलाओं का नाम मतदाता सूची में जोड़ना समस्या बन गई थी। वे नाम बताने में झिझकती थीं। इसकी वजह से  80 लाख महिलाओं का नाम मतदाता सूची में आने से रह गया। चुनाव के लिए 56000 लोगों को पीठासीन अधिकारी बनाया गया। 2 लाख 24 हजार पुलिसकर्मियों को सुरक्षा के लिए तैनात किया गया।

शुरुआती चुनावों में कुछ मतदान केंद्र दुर्गम इलाकों में थे। चुनाव सामग्री पहुंचाने के लिए पुल बनाए गए। कुछ दूरस्थ इलाकों में थे जहां कर्मचारी को पहुंचने में काफी दिक्कत थी। मतदान संदेश के लिए कबूतरों का भी इस्तेमाल किया गया। उस समय संसाधनों का अभाव था। देश में उस वक्त काफी निरक्षता थी। अधिकतर मतदाताओं के साक्षर न होने के कारण मतपत्र में मतदाताओं के नाम के आगे चुनाव चिह्न छापा गया था। मतदान केंद्र पर मतपेटियां रखी रहती थीं, जिस पर पार्टी का चुनाव चिह्न होता था। वोटर उसमें अपने मनपसंद प्रत्याशी को वोट देते थे।

नकली मतदाताओं से बचने के लिए भारतीय वैज्ञानिकों ने एक ऐसी स्याही खोजी जो मतदाता की अंगुली पर कई दिनों तक रहती थी।   वोटरों को जागरूक करने के लिए अभियान चलाए गए। पहला चुनाव 1951-52 में लोकसभा की 489 सीटों के लिए लोहे की मतपेटियों के साथ हुआ। चुनाव आयोग ने चुनाव प्रक्रिया में  इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन ( ईवीएम ) का इस्तेमाल क्रांतिकारी कदम था। इनकी कल्पना 70 के दशक में की गई थी, लेकिन प्रयोग पहली बार 1998 में एक विधानसभा चुनाव में किया गया। ईवीएम 1999 में संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों में भी इस्तेमाल की गईं। 2004 के आम चुनावों में सभी 543 संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों में दस लाख से अधिक ईवीएम का इस्तेमाल किया गया। हालांकि कुछ दलों ने इसे लेकर सवाल भी उठाए। चुनाव आयोग ने विपक्षी दलों की आशंकाओं को दूर करने के लिए कई प्रयास भी किए।

पहले चुनाव में महिलाओं के लिए अलग बूथों का प्रबंध किया। बाद में चुनाव आयोग ने दिव्यांगों  के लिए रैंप और व्हीलचेयर, ब्रेल मतदाता पर्चियां, ब्रेल साइनेज के साथ ईवीएम, चुनावी फोटो पहचान पत्र तक की भी यात्रा तय की। वोटर वेरिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल ( वीवीपीएटी) को अगस्त 2013 में चुनाव संचालन नियम, 1961 में संशोधन और अधिसूचित होने के बाद मतदान प्रक्रिया में पारदर्शिता के लिए पेश किया गया। उपरोक्त में से कोई नहीं (नोटा) वोट का विकल्प 2014 के लोकसभा चुनावों में पेश किया गया।
विज्ञापन

नेहरू से लेकर मोदी युग तक
पहले चुनाव से लेकर 1964 तक देश में नेहरू का एक छत्र राज रहा। 27 मई 1964 को उनके निधन के बाद लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने। उनका कार्यकाल 18 माह ही रहा। 11 जनवरी 1966 को ताशकंद में उनका निधन हो गया। इसके बाद इंदिरा गांधी का राज शुरू हो गया। इंदिरा पहली बार 1967 में प्रधानमंत्री बनीं। 1975 में आपातकाल के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस को सत्ता से हाथ धोना पड़ा और 1977 के चुनाव में देश में पहली बार गैर कांग्रेस सरकार काबिज हुई। मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। जनता पार्टी में आपसी फूट के बाद कांग्रेस एक बार फिर सत्ता में लौटी। 1996 में भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनाई। 2004 में एक बार फिर कांग्रेस सत्ता में रही। 2014 से मोदी युग आरंभ हो गया। 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें