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Agra : रमजान के 20वें रोजे पर बंद रहता है हजरत सलीम चिश्ती का दरगाह, लाल रंग के पर्दे से ढका रहता है दरवाजा, फर्श पर बिछी होती है हरे रंग की चादर, जिस पर चढ़ाए जाते हैं लाल गुलाब के फूल

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रमजान के 20वें रोजे पर लाल पर्दे से ढका सलीम चिश्ती दरगाह का दरवाजा
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आगरा। फतेहपुर सीकरी स्थित सूफी संत हजरत सलीम चिश्ती की दरगाह पर उर्स का पवित्र उत्सव रमजान के बीसवें रोजे से शुरू हो गया है। यह दरगाह दुनिया की एकमात्र ऐसी दरगाह है जो इस विशेष दिन पर बंद रहती है, हालांकि जायरिनों के लिए विशेष व्यवस्था की जाती है। यह दिन इस्लामी इतिहास में फतेह मक्का के रूप में भी मनाया जाता है, जब हिजरी कैलेंडर के अनुसार आठ हिजरी में पैगंबर मोहम्मद साहब ने मक्का फतह की थी।
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उर्स के दौरान दरगाह में प्रवेश का मुख्य द्वार लाल रंग के पर्दे से ढका होता है। फर्श पर हरे रंग की चादर बिछाई जाती है, जिस पर इस दिन आने वाले जायरिन लाल गुलाब और चादर चढ़ाते हैं। बीसवें रोजे पर यहां विशेष इबादत ''''एतिकाफ'''' अदा की जाती है। ''''एतिकाफ'''' रमजान के आखिरी दस दिनों की विशेष इबादत है, जिसमें लोग मस्जिद या दरगाहों के एकांत में प्रार्थना करते हैं। इस दिन दरगाह परिसर को विशेष लाइटनिंग से जगमगाया जाता है। अगले दिन अल सुबह सूर्योदय के साथ ''''गुल की रस्म'''' अदा की जाती है। ''''उर्स'''' शब्द का अर्थ ''''विवाह'''' या ''''शबे उरूसी'''' है, जो संत की आत्मा के परमात्मा से मिलन का प्रतीक माना जाता है। इस उत्सव में कव्वाली, जियारत, चादरपोशी और मन्नतें मांगने की परंपराएं शामिल हैं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

हजरत सलीम चिश्ती मुगल बादशाह अकबर के गुरु थे। संतान न होने पर बादशाह अकबर ने यहां आकर सलीम चिश्ती से दुआ की गुजारिश की थी। उनकी भविष्यवाणी के बाद ही अकबर के बेटे जहांगीर का जन्म हुआ। 1570 में मुगल बादशाह अकबर द्वारा लाल पत्थर से इस दरगाह का निर्माण करवाया गया था।
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वास्तुकला और मन्नतें

बादशाह जहांगीर ने बाद में इस दरगाह पर सफेद संगमरमर लगवाया। यह दरगाह अपनी महीन और नायाब जालीदार नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है, जहां लोग मन्नतें मांगने आते हैं। यहां लोग लाल गुलाब चढ़ाने के पश्चात लाल धागे को बांधकर मन्नत मांगते हैं। जालीदार नक्काशी में लाल धागे से तीन गांठें बांधने के साथ तीन मन्नतें मांगने की परंपरा है। मन्नतें पूरी होने के बाद लोग चादरपोशी के लिए दोबारा आते हैं। रिपोर्ट : सचिन

रमजान के 20वें रोजे पर लाल पर्दे से ढका सलीम चिश्ती दरगाह का दरवाजा

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