दिवाली नजदीक आते ही आगरा के कुम्हार मिट्टी के दीये, सुराही, कुल्हड़ और खिलौने बनाने में जुट गए हैं। बोदला से लोहामंडी तक कुम्हारों को उम्मीद है कि इस बार उनके बनाए दीयों से घर रोशन होंगे। हालांकि, चाइनीज दीयों की चमक और बढ़ती लागत ने उनकी चिंता बढ़ा दी है। 80 पैसे का मिट्टी का दीया बनाने के बावजूद कुम्हारों को बाजार में उचित दाम और बिक्री नहीं मिल पा रही है।
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दिवाली नजदीक आते ही मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हारों की चाक ने रफ्तार पकड़ ली है। बोदला से लोहामंडी तक कुम्हार इस आस में दिन-रात एक किए हुए हैं कि इस बार उनके बनाए दीये घरों को रोशन करेंगे। सुराही, कुल्हड़ और खिलौनों को भी अंतिम रूप दिया जा रहा है। हालांकि, चाइनीज सामान के बढ़ते चलन ने इनके सामने संकट खड़ा कर दिया है।
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कुम्हार रमाशंकर ने बताया कि हमारे यहां यह पारंपरिक काम कितनी पीढ़ियों से चल रहा है, हमें तो याद भी नहीं। मैं खुद 12 साल की उम्र से मिट्टी के बर्तन और दीये बना रहा हूं। जब हमारे बनाए दीयों से लोगों के घर जगमगाते हैं तो सारी थकान मिट जाती है।
कुम्हार सुरेश चंद्र का कहना है कि नई पीढ़ी में मिट्टी के दीयों का क्रेज कम होता जा रहा है। हमारे पास मिट्टी का एक दीया महज 80 पैसे का है, जबकि चाइनीज दीया 2 रुपये में बिकता है। कीमत में इतना अंतर होने के बाद भी लोग चमक-दमक के चक्कर में चाइनीज माल को ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं।
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कुम्हार बेबी ने कहा कि हर साल इस उम्मीद के साथ दिये तैयार करते हैं कि इस बार बिक्री अच्छी होगी। मिट्टी के दाम और मेहनत दोनों बढ़ गए हैं लेकिन बाजार में सही दाम नहीं मिल पाता।