बाह। पाक बॉर्डर पर आतंकियों के छक्के छुड़ाने वाले बाह के सिमराई गांव के देवेन्द्र सिंह (42) शुक्रवार को कैंसर से जिंदगी हार गए। शनिवार को भारत माता के जयकारों के बीच सैनिक सम्मान के साथ उनकी अंत्येष्टि हुई। बहादुरी के किस्सों के बीच सैकड़ों लोगों ने अंतिम विदाई दी।
6 मार्च 2000 के दिन सिमराई के जसवंत सिंह के बेटे देवेंद्र सिंह 22 राजपूत रेजीमेंट में भर्ती हुए थे। वर्तमान में अलमोड़ा में बतौर हवलदार तैनात थे। गांव के प्रधान एवं ऑपरेशन रक्षक में उनके साथ शामिल रहे जयवीर सिंह, भाई रामसेवक, इंद्रेश सिंह ने बताया कि 2 साल पहले कैंसर की चपेट में आए थे। आगरा के मिलिट्री हॉस्पिटल में शुक्रवार की शाम 6.30 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। शनिवार को तिरंगे में लिपटा उनका शव सिमराई पहुंचा तो अंतिम विदाई देने के लिए क्षेत्र भर के लोग उमड़ पड़े। 29 पैरा के नायब सूबेदार सोनू सिंह, हवलदार चेतराम, शेर सिंह, रंजन, 22 राजपूत रेजीमेंट की उनकी यूनिट के नायब सूबेदार परिमल कसाना, हवलदार देवेन्द्र सिंह, नायक करन गुर्जर, नायक धर्मवीर, विनीत गुर्जर, दीपक सिंह आदि ने सलामी दी। सैन्य सम्मान के साथ हुई अंत्येष्टि में ऑपरेशन रक्षक से लेकर विभिन्न मौर्चों पर आतंकियों को खदेड़ने के किस्से सुन लोग भावुक हो उठे। जय हिंद, भारत माता के जयकारे लगाए। प्रधान जयवीर सिंह, भाई रामसेवक, रामकिशन, रंजीत सिंह, सूबेदार यशपाल सिंह, रामवीर सिंह, श्यामवीर, हरवीर, सचिन, रंजीत, देवेन्द्र सिंह प्रधान, पूरन सिंह, राकेश सिंह, कमलेश सिंह आदि रहे।
तिरंगा थाम बेटे बोले हम भी बनेंगे फौजी अफसर
अंतिम संस्कार के समय सैनिकों ने तिरंगा दिवंगत देवेन्द्र सिंह के बेटों गोलू और नितिन को सौंपा तो दोनों भावुक हो गये। बोले वे भी फौजी अफसर बनेंगे। पापा का संघर्ष उन्हें जीवन में हमेशा प्रेरित करता रहेगा, बहादुरी के किस्से उनका संबल बनेंगे। बतादें कि देवेन्द्र सिंह अपने 8 भाइयों में चौथे नंबर की संतान थे।
टूटी बेटी को डोली में बिठाने की हसरत
आगरा के मिलिट्री हॉस्पिटल में अंतिम समय तक हवलदार देवेंद्र सिंह अपनी पत्नी मिथलेश देवी और बेटी शिवानी का हाथ थामे रहे। शिवानी की एक मार्च को शादी होनी है। परिजन ने बताया कि अंतिम सांस लेने से एक घंटे पहले तक बातचीत करते रहे थे, उन्हें अपनी मौत का पूर्वाभास हो गया था। कह रहे थे कि बेटी को डोली में बिठाने की हसरत पूरी नहीं कर सके। मिथलेश देवी से बेटी की शादी से लेकर बेटों के बारे में बातें करते रहे। कह रहे थे कि सबको संभालना, बेटों की पढ़ाई और उनके सपने को पूरा करने में मदद करना।