अपहरण और हत्या के मामले में 6 साल, 6 महीने और 23 दिन जेल में रहने के बाद अरुण कुमार उर्फ दीपक को सुप्रीम कोर्ट ने साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया। परिवार का दावा है कि कानूनी लड़ाई में 15 बीघा जमीन बेचनी पड़ी और मकान 15 लाख रुपये में गिरवी रखना पड़ा।
अपहरण और हत्या के आरोप में 6 वर्ष 6 महीने और 23 दिन सलाखों के पीछे काटने वाले रुनकता निवासी अरुण कुमार उर्फ दीपक को सुप्रीम कोर्ट ने साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया। परिजन का कहना है कि न्याय पाने के लिए पूरे परिवार को आर्थिक संकट से जूझना पड़ा। बेटे को बेगुनाह साबित करने की कानूनी जंग में पिता की 15 बीघा जमीन बिक गई। मकान भी 15 लाख रुपये में गिरवी हो गया। 6 लाख रुपये के मुआवजे को पिता ने काफी कम बताया।
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रुनकता निवासी राकेश कुमार ने बताया कि 13 नवंबर 2019 को पुलिस अरुण को घर से ले गई थी और अगले दिन जेल भेज दिया। जेल जाने से पहले बेटा अरुण बीटीसी की पढ़ाई कर रहा था। वह पूरी तरह से बर्बाद हो गया। तब उसका बेटा 2 वर्ष का था, जोकि अब 9 वर्ष का है। अरुण बेटे के बचपन के उन कीमती वर्षों में उसके साथ नहीं रह सका। यह सब पुलिस की लापरवाही से हुआ। बेटे को बेगुनाह साबित करने के लिए परिवार को सत्र न्यायालय से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पैरवी करनी पड़ी।
इस वजह से जलेसर के गांव भींतर में स्थित 15 बीघा जमीन बिक गई। रुनकता का मकान भी 15 लाख रुपये में गिरवी रखना पड़ा। 6 लाख रुपये की मुआवजा राशि मिलने के बाद भी दर्द की भरपाई नहीं हो सकती।
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बेटे का पूरा जीवन बर्बाद हो गया
मां रामवती का कहना है कि बेटे का पूरा जीवन बर्बाद हो गया। वह अपने बच्चे को पिता का प्यार नहीं दे पाया। हर दिन यही आस रहती थी कि कब उसे निर्दोष साबित करा पाएंगे। एक भी रात ठीक से नहीं सोई। आखिर में न्याय मिला।