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सुलह पर भी राजी नहीं दपंती

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सुलह पर भी राजी नहीं दपंती - फोटो : अमर उजाला
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कासगंज। सात जन्मों के बंधन की डोर कमजोर हो रही है। परिवार परामर्श केंद्र के आंकड़े कुछ यही बयां करते हैं। जनवरी 2018 से अब तक 280 दंपतियों के मामले आ चुके हैं जिसमें केंद्र की पहल पर 114 दंपतियों में सुलह हुई। कई मामले तो ऐसे आए जो सुलह पर भी राजी नहीं हुए।
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ग्रामीण क्षेत्रों के मुकाबले शहरी क्षेत्र के दंपतियों के मामले ज्यादा आ रहे हैं। कई जोड़े ऐसे हैं जिनमें शादी के चार से पांच साल बाद ही अनबन हो गई। 132 मामलों में परामर्श केंद्र में समझौते से भी बात नहीं बनी। परिवार परामर्श केंद्र के सदस्य अशोक सिसौदिया का कहना है कि प्रत्येक व्यक्ति को स्वाभिमान के साथ जीना चाहिए, लेकिन स्वाभिमान को अभिमान में नहीं बदलना चाहिए। क्योंकि अभिमान की बुनियाद पर रिश्ते नहीं बनाए जाते।
आंकड़े एक नजर में
- 280 दंपती साथ रहने में जता चुके असहमति।
- 18 मामलों में परामर्श केंद्र ने दर्ज कराया मुकदमा।
- 132 पत्रावली की गईं बंद।
- 114 मामलों में हुए समझौते।

आज कल युवा शादी को एक सुविधाजनक रिश्ता मानते हैं। जब उन्हें असहजता महसूस होती है तो वे एक दूसरे की भावनाओं को समझने के बजाए बेझिझक रिश्ता तोड़ने का फैसला ले लेते हैं। महिलाएं आत्मनिर्भर हो गई हैं। अहंकार टूटते रिश्तों का मुख्य कारण है।
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मोहिनी तोमर, अधिवक्ता
कम समय में तलाक के पीछे बड़ा कारण पति-पत्नी के रिश्ते में अहम है। अगर दोनों के बीच किसी बात को लेकर विवाद होता है तो परिवार के बड़े सदस्यों का फर्ज है कि किसी एक का पक्ष न लेकर दोनों को समझ्राएं।
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- इंदू वर्मा, प्रभारी परिवार परामर्श केंद्र
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