मैनपुरी। भले ही सरकार ने शारीरिक एवं खेल शिक्षा को अनिवार्य कर दिया है, लेकिन धरातल पर ये दम तोड़ती नजर आ रही है। जिन लोगों पर खेल शिक्षा की जिम्मेदारी है वे प्रधानाध्यापक के निर्देशन में अन्य कार्य देख रहे हैं। यही कारण है कि जनपद में खेल शिक्षा को पंख नहीं लग पा रहे हैं।
वर्ष 2010 में जिले में शारीरिक एवं खेल शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए उच्च प्राथमिक विद्यालयों में खेल अनुदेशकों की तैनाती की गई थी। जनपद के 99 उच्च प्राथमिक विद्यालयों में वर्तमान में खेल अनुदेशकों की तैनाती है। लेकिन ये अनुदेशक बच्चों को शारीरिक शिक्षा और खेल के स्थान पर हिंदी और अंग्रेजी का ज्ञान देते हुए देखे जा रहे हैं। शारीरिक शिक्षा और खेलों की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। यही कारण है कि जनपद से खेल प्रतिभाएं निकलके नहीं आ रही हैं। अधिकतर खिलाड़ी मंडल स्तर से ही बाहर हो जाते हैं।
40 स्कूलों से नहीं स्थान बना पाया था एक भी छात्र
मैनपुरी। जनपद के जिन 99 स्कूलों में खेल अनुदेशकों की तैनाती है। गत वर्ष की मिनी क्रीड़ा प्रतियोगिता के दौरान इनमें से 40 स्कूलों से एक भी खिलाड़ी जनपद स्तर पर स्थान नहीं बना पाया था। इससे साबित होता है कि अनुदेशकों से खेल की जगह पर अन्य कार्य लिए जा रहे हैं।
बिना प्रशिक्षण के ही खेलों में प्रतिभाग करते हैं छात्र-छात्राएं
मैनपुरी। अनुदेशकों की जिम्मेदारी है कि वे अपने ही नहीं बल्कि अपने कैंपस में संचालित सभी स्कूलों के बच्चों को प्रशिक्षित करें। जबकि अधिकतर खेलों में देखने को मिलता है कि बिना प्रशिक्षक के ही खिलाड़ी खेलों में भाग लेने पहुंचते हैं।
सभी खेल अनुदेशकों को निर्देश दिए गए हैं कि वे प्रतिदिन स्कूलों में बच्चों को खेल का प्रशिक्षण दें। यदि कहीं लापरवाही हो रही है तो उसका पता लगाकर कार्रवाई की जाएगी।
विजय प्रताप सिंह बीएसए