मथुरा। अफसर तय नहीं कर पा रहे हैं कि मथुरा शहरी क्षेत्र में उत्सर्जित की मात्रा क्या है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अफसरों की नजर में मथुरा में उत्सर्जित जल की मात्रा 85 एमएलडी है तो सिटी मजिस्ट्रेट ने इसे 60-70 एमएलडी बताया था। डीएम इसे अब 48.6 एमएलडी दर्शा रहे हैं। नगर निगम के पूर्व ईओ ने यह मात्रा 90 एमएलडी बताई थी। इससे प्रदूषित जल को नियंत्रित करने की योजना पर सवाल उठ रहे हैं।
सोमवार को राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) में हुई यमुना के मामले की सुनवाई के तहत याची सिटीजन वेलफेयर सोसायटी ने प्राधिकरण के सामने यह सभी तथ्य पेश किए। सोसाइटी के संयोजक उमेश भारद्वाज ने एनजीटी में कहा है कि मथुरा के नालों का पानी ड्रेन की तरह से यमुना में जा रहा है। जबकि संबंधित विभागों के पास पानी के मापन का कोई प्रबंध नहीं है। पानी की मात्रा को लेकर ही विरोधाभास है।
सुनवाई के दौरान उन्होंने मथुरा में यमुना की स्थिति बेहद खराब बताते हुए फोटो भी प्रस्तुत किए हैं। इसके अलावा यमुना का जल भी एनजीटी के समक्ष प्रस्तुत किया है। उधर, कुछ दिन पूर्व जिले के अधिकारियों ने मामले में अपना पक्ष पेश किया था। उसी के जवाब में सोसायटी ने अपने तथ्य पेश किए हैं।
इसमें कहा है कि शहरी क्षेत्र को सीवेज योजना के तहत चार जोन में बांटा था, जिसमें से सिर्फ ट्रांस यमुना में सीवर लाइन डाली गई है। इसमें भी सिर्फ पांच प्रतिशत ही लाइन चालू हो सकी है। पूरा पानी यमुना में जा रहा है। इसमें रसायन युक्त पानी भी शामिल है। यह भी कहा गया है कि 430 करोड़ की डीपीआर में बनने वाले सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में यह स्पष्ट नहीं है कि यह सीवर को शोधित करेगा या फिर रसायन युक्त जल का भी ट्रीटमेंट होगा।