मथुरा। ब्रिटिश हुकूमत के शासनकाल की गुलामी का अहसास भले ही वर्तमान पीढ़ी को न हो, लेकिन इस आजादी को पाने के लिए क्रांतिकारियों ने बड़ा बलिदान दिया है। फरह के गांव परखम में अंग्रेजों द्वारा दी गई यातनाओं की कहानी को सुन रूह कांप जाती है।
बात उन दिनों की है जब देश में अंग्रेज भारत छोड़ो आंदोलन की ज्वाला तेज हो रही थी। जगह-जगह आंदोलन हो रहे थे। स्वतंत्रता के इस आंदोलन में मथुरा भी सहभागिता कर रहा था। इस दौरान आर्थिक तंगी से जूझ रहे क्रांतिकारियों को सूचना मिली कि अंग्रेज अफसर कानपुर से आगरा के लिए मालगाड़ी में वेतन लेकर आ रहे हैं। मालगाड़ी कानपुर, बरेली के रास्ते आगरा को जानी थी। 14 अगस्त 1942 की रात क्रांतिकारियों ने मालगाड़ी में खजाने को लूटने की योजना बनाई। इसके लिए फरह के गांव परखम को सुरक्षित माना।
बड़ी संख्या में परखम के युवाओं को साथ लेकर क्रांतिकारियों ने रात 10 बजे रेलवे स्टेशन के पास पटरी उखाड़ दी। रात 12 बजे तक मालगाड़ी यहां से गुजरी तो उखड़ी पटरी के कारण पलट गई। क्रांतिकारियों ने ग्रामीण युवकों के साथ अंग्रेजों का खजाना लूट लिया।
इसकी जानकारी जब मथुरा के कलक्टर को हुई तो सैनिकों के साथ परखम गांव पहुंचे। गांव से दर्जनों युवकों को गिरफ्तार कर लिया गया। ग्राम का पुस्तकालय डाकघर और पंचायत घर को आग लगा दी। घरों में घुसकर महिला-पुरुषों को बेरहमी के साथ पीटा गया। अनेक लोग घरों को छोड़कर भाग गए। पकड़े गए युवकों के नाखूनों को खींचा गया। उनके शरीर के अंगों को गर्म लोहे से जलाया गया। यातना का यह दौर गांव में दो माह तक चला।