सब्जियों का राजा आलू किसानों से रूठ गया है। अच्छे दाम और मुनाफे की उम्मीद में बोई आलू की फसल अब किसानों के लिए घाटे का सौदा बन गई है। आलम यह है कि पहले पुराने आलू ने किसानों के आंसू निकाले, तो नया आलू भी किसानों के जख्मों पर नमक बन रहा है। अच्छे दाम मिलने की आस में आलू को बोने वाले किसान अब लागत निकालने की कोशिश में जुटे हैं। जिले में आलू की बेकदरी ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। मंडी में जहां भाव 300 रुपये प्रति पैकेट हैं, तो बाजार में छह रुपये किलो बिक रहा है।
जिले में सात हजार हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल में आलू की बुवाई की गई थी। पहले हुई पैदावार को किसानों ने कोल्ड स्टोर में रख दिया, मगर जब उचित दाम नहीं मिला, तो किसानों ने कोल्ड स्टोर से आलू निकाला नहीं। इसके बाद जब आलू की नई फसल बोई तो कोहरे के चलते आलू को झुलसा रोग लग गया। रोग के चलते आलू को नुकसान हुआ। हालांकि किसानों ने पारंपरिक तरीके से छिड़काव किया, लेकिन मौसम की मार ने आलू किसानों को बर्बाद कर दिया। अब आलम यह है कि रोग के बाद जब किसान आलू लेकर मंडी पहुंच रहे हैं, तो वहां भी उनको भाव नहीं मिल रहा। बंपर पैदावार और रोग के प्रकोप के चलते मंडी व्यापारी भी मनमानी कीमत पर आलू की खरीद कर रहे हैं। मौजूदा दौर में मंडी समिति में 250 से 300 रुपये प्रति पैकेट का दाम किसानों को दिया जा रहा है। ऐसे में किसानों के लिए लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है। वहीं बाजार में आलू के दाम छह रुपये किलो तक टिके हुए हैं। किसान आलू की बेकदरी को लेकर परेशान हैं। वहीं गेहूं की फसल को लेकर किसान अच्छी पैदावार की उम्मीद लगाए हैं। किसानों का कहना है कि आलू ने तो उनकी परेशानी बढ़ा दी है, लेकिन गेहूं की पैदावार से आस है कि कुछ मुनाफा होगा।
आलू ने इस बार खासी दिक्कत बढ़ा दी है। बंपर पैदावार के चलते आलू के भाव गिरते जा रहे हैं। लागत निकालना भी मुश्किल है।
अतर सिंह वर्मा
किसानों को फसल का सही दाम नहीं मिलने से ही लोग खेती का व्यवसाय छोड़ रहे हैं। अब आलू ने भी किसानों को रुला दिया है।
चिरंजीलाल वर्मा
पुराने आलू की भी लागत नहीं निकल सकी। अब मौसम की मार के चलते आलू झुलस गया है। इससे पूरी आर्थिक स्थिति चरमरा गई है।
धनवंती देवी
किसानों को आलू के सही दाम मिल नहीं रहे हैं। आलू 300 रुपये प्रति 50 किलो के हिसाब से खरीद जा रहा है। लागत भी नहीं मिल रही।
शमशीदा खान
व्यापारी कहते हैं
नया आलू अधिकतर झुलसा से पीड़ित आ रहा है। ऐसे में बाजार में आलू के दाम अटक गए हैं। उसी हिसाब से किसान से आलू खरीद रहे हैं।
मोहम्मद रईस
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नया आलू 300 रुपये प्रति पैकेट तक खरीद रहे हैं। बाजार में आलू को तरजीह नहीं मिल रही है। पैदावार बढ़ने से आलू के दाम गिर गए हैं।
शकील राईन
कहते हैं आंकड़े
7000 से अधिक हेक्टेयर क्षेत्र में हुई थी आलू की फसल
300 रुपये प्रति पैकेट खरीदा जा रहा आलू
06 रुपये किलो आलू की बाजारी कीमत
8180 हेक्टेयर में पिछले साल हुई थी बुवाई
कासगंज में 400 हेक्टेयर घटा आलू का रकबा
कासगंज। आलू पर चल रही लगातार मंदी की मार से किसान अब आलू की खेती से मुंह मोड़ रहे हैं। इस बार किसानों ने आलू की खेती कम की है। 400 हेक्टेयर क्षेत्रफल में आलू की कम बुवाई होने के कारण उत्पादन पर इसका असर आएगा।
पुराने आलू का भाव इतना कम हो गया कि किसान शीतगृह का भाड़ा भी नहीं चुका पाए। ऐसी स्थिति में हजारों बोरी आलू किसानों ने कोल्ड स्टोर में ही छोड़ दिया। जिले में करीब 50 हजार बोरी आलू कोल्ड स्टोर के बाहर फेंकना पड़ा। वहीं 50 हजार बोरी आलू 60 से 100 रुपये की कीमत तक बेचा गया। बाद में हालात यह हो गए कि कोई भी आलू खरीदने को तैयार नहीं हुआ और आलू को फेंकना पड़ा। जिले में आलू का 5200 हेक्टेयर क्षेत्रफल में आलू की बुवाई की जाती है। पिछले वर्ष भी इतने आलू की बुवाई की गई, लेकिन इस बार मंदी से आहत किसान ने आलू की बुवाई कम की। अगैती फसल की बुवाई के दौरान किसान मायूस रहे। पिछैती बुवाई के दौरान ज्यादातर किसानों ने आलू की बुवाई की।
ऐसी स्थिति में 400 हेक्टेयर क्षेत्र में आलू की फसल कम लगाई गई। नए आलू का भाव भी इन दिनों मंडी में पांच से साढ़े पांच रुपये किलो का है। नए आलू की कीमत भी कम है। जिससे किसानों की लागत भी नहीं निकल पा रही है। किसानों का मानना है कि आलू की कीमत कम से कम दस रुपये किलो होनी चाहिए जिससे किसानों को कुछ लाभ मिल सके। किसान रामखिलाड़ी बघेल ने बताया कि आलू की फसल लगातार घाटा दे रही है। सरकार को किसानों के आलू की सरकारी खरीद की व्यवस्था करनी चाहिए जिससे किसानों को उचित मूल्य मिल सके। उद्यान निरीक्षक देवपाल सिंह ने बताया कि आलू की खेती को लेकर किसानों में मायूसी है। इस बार 400 हेक्टेयर क्षेत्रफल में आलू की कम बुवाई की गई है।
- किसानों को आलू की फसल का सही मूल्य नहीं मिल पाता। इस बार तो किसानों को आलू कोल्ड स्टोर में ही छोड़ना पड़ा। किसानों को आलू का सही मूल्य मिले इस दिशा में सरकार को काम करना चाहिए।
- ईश्वरीय चिक, किसान ग्राम सनौड़ी
- किसान को अपनी फसल का मूल्य निर्धारित करने का अधिकार नहीं है। किसान बाजार पर निर्भर है। जैसा भाव बाजार में रहता है उसी हिसाब से किसान को अपना माल बेचना पड़ता है, चाहें आलू की फसल हो या कोई और फसल।
भरत सिंह शाक्य रमपुरा