नंदगांव (मथुरा)। पूरे भारतवर्ष के मंदिरों में सावन के महीने में राधा-कृष्ण को झूला झुलाते हैं। लेकिन कृष्ण की क्रीड़ास्थली और राधा रानी की ससुराल नंदगांव के विश्व प्रसिद्ध नंदबाबा मंदिर में नहीं। यहां कृष्ण और बलराम को झूला झुलाया जाता है, राधा-कृष्ण को नहीं।
सावन मास लगते ही ब्रज में उत्सवों की एक शृंखला शुरू हो जाती है। कन्हैया की क्रीड़ास्थली नंदगांव में हिंडोला उत्सव गुरु पूर्णिमा से शुरू होकर रक्षाबंधन तक चलता है। नंदीश्वर पर्वत पर स्थित नंदबाबा के प्राचीन मंदिर में रोजाना शाम को कृष्ण और बलराम के विग्रहों को सोने-चांदी के निर्मित भव्य हिंडोले में आकर्षक पोशाकों से सजा कर झुलाया जाता है। ब्रज परंपरा के अनुसार युवतियां अपने मायके में ही सावन मास में झूला झूलती हैं। राधा रानी भी अपनी ससुराल में कैसे झूला झूल सकती हैं।
नंदबाबा मंदिर के सेवायत रमेश चंद गोस्वामी के अनुसार मान्यता है कि आषाढ़ मास में राधा रानी एक बंजारे के हाथों बरसाना बुलवाए जाने का संदेश भिजवाती हैं। रथयात्रा के दिन राधारानी के भाई श्रीदामा रथ में बिठा कर राधे जू को बरसाना ले जाते हैं। सावन मास में राधारानी के नंदगांव न होने के चलते श्री कृष्ण और बलराम ही झूला झूल कर आनंद मनाते हैं। ससुराल होने के नाते राधारानी को मर्यादा में रहना पड़ता है। राधा की इसी मर्यादा को सेवायत भी निभाते चले आ रहे हैं। यही वजह है कि झूलन महोत्सव में राधा कृष्ण के बजाय कृष्ण बलराम को नंदभवन में सोने-चांदी के हिंडोलों में झूला झुलाया जाता है। विभिन्न अवसरों पर फल, फूल और पत्तियों से इन हिंडोलों को सजाया जाता है। हरियाली तीज के अवसर पर संध्या के दौरान प्राकृतिक फूल-पत्तियों से हिंडोले को सजाया जाएगा।