समाजवादी पार्टी मुखिया मुलायम सिंह यादव के पैतृक गांव सैफई की पहचान देश भर में है। कभी हवाई पट्टी तो कभी सैफई महोत्सव के चलते देश भर में चर्चित रहने वाला सैफई गांव का इतिहास सैकड़ों नहीं बल्कि चार हजार साल पुराना है। इटावा से महज 18 किमी दूर सैफई में एएसआई (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) ने उत्खनन कराया तो यहां गैरिक मृदभांड और तांबे की हारपुन मिली। एएसआई के उत्खनन की यह रिपोर्ट इटावा के आधिकारिक इतिहास को बदल कर रख देगी, जो इटावा को महज 12वीं सदी से जुड़ा मानती है।
सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद 1989 से सैफई चर्चाओं में आया, लेकिन सैफई का इतिहास चार हजार साल पुराना है। यहां ईसा से 2000 साल पहले की सभ्यता मौजूद है। अगस्त 1966 में खेत की जुताई करते वक्त यहां कुल्हाड़ियां, बर्छियां, भालों के अग्रभाग, मानवकृत और वलय जैसी तांबे की कई चीजें मिलीं। एएसआई के बीबी लाल के निर्देशन में तत्कालीन पुरातत्वविद् एलएम बहल ने दिसंबर 1970 से फरवरी 1971 के बीच उत्खनन कराया, जिसमें तांबे का हुकदार बाणाग्र और गैरिक मृदभांड मिले। गैरिक मृदभांड ईसा से दो से 1500 साल पहले के काल में मिलते हैं। एएसआई ने वर्ल्ड हेरिटेज वीक के दौरान आगरा के किले में सैफई में हुए उत्खनन का ब्योरा प्रदर्शनी में पेश किया है। भारतीय पर्यटकों के लिए यह ब्योरा बेहद चौंकाने वाला है। एएसआई अधीक्षण पुरातत्वविद डा. भुवन विक्रम के मुताबिक, सैफई में उत्तर हड़प्पाकाल के दौरान ग्रामीण सभ्यता में प्रयोग किए गए मिट्टी के बर्तन प्राप्त हुए, जिससे सैफई में चार हजार साल पहले सभ्यता और संस्कृति होने के प्रमाण मिलते हैं।