अंत भला तो सब भला। सुरेश नगर में साढ़े चार घंटे से अधिक समय तक चले ‘लेपर्ड रेस्क्यू ऑपरेशन’ का यही अंजाम रहा। रेस्क्यू टीम ने न तो लोगों में भगदड़ मचने दी और न ही तेंदुए को ही ज्यादा परेशान किया। बीअर रेस्क्यू सेंटर से वाइल्ड लाइफ की टीम ने स्थानीय लोगों के साथ मिलकर जिस तरह से ऑपरेशन को कुशलतापूर्वक अंजाम तक पहुंचाया, उसकी हर किसी ने प्रशंसा की।
सुरेश नगर में तेंदुए को पकड़ने के लिए शाम लगभग चार बजे रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू हुआ। दिन के उजाले में शुरू हुआ यह ऑपरेशन रात लगभग पौने नौ बजे खत्म हुआ। इस बीच कई बार रणनीति बनी और बदली गई। रेस्क्यू टीम के सामने सबसे बड़ी चुनौती बिना भगदड़ मचे तेंदुए को पकड़ना था। क्योंकि तेंदुआ यदि एक बार कमरे से बाहर निकल आता तो उसे ट्रेंकुलाइज (बेहोश) करना मुश्किल हो जाता। वह लोगों को नुकसान भी पहुंचा सकता था। इसके लिए सबसे पहले तो उस कमरे के बाहर दोनों तरफ जाल बिछाया गया, जिसमें तेंदुआ छुप कर बैठ गया था। अब चुनौती ट्रेंकुलाइज करनी की थी। क्योंकि सामने जाकर ट्रेंकुलाइज करने पर वह अटैक करने के साथ ही बाहर की तरफ भाग भी सकता था। इसके लिए सबसे पहले तो सरिया के माध्यम से दूसरे कमरे में सही उस छोटे कमरे के दरवाजे को बंद किया गया। उस बीच लगभग डेढ़ घंटा गुजर चुका था। इसके बाद ट्रेंकुलाइज के लिए दीवार को काटने की मशक्कत शुरू की गई। ड्रील मशीन से दूसरी तरफ से दीवार काटी गई। देर शात लगभग सात बजे दीवार में बड़ा सा होल किया गया। यहीं से वाइल्ड लाइफ के डा. इलैया राजा ने उसे ट्रेंकुलाइज से बेहोश किया। रात लगभग पौने नौ बजे तेंदुए को पिंजरे में बंद कर बाहर निकाला गया। इसके बाद तो रेस्क्यू टीम को बधाई देने का सिलसिला शुरू हो गया।
तीन बार किया गया ट्रेंकुलाइज
रेस्क्यू टीम तेंदुए पर आसानी से काबू नहीं पा सकी। इसके लिए उसे घंटों पसीना बहाना पड़ा। अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि तेंदुए को पहला ट्रेंकुलाइज शाम लगभग सात बजे लगाया गया। इसके बाद उसके बेहोश होने का इंतजार किया गया। डा. इलैया राजा का कहना था कि ट्रेंकुलाइज लगभग 15-20 मिनट बाद असर दिखाना शुरू करता है। रेस्क्यू टीम दरवाजे के बाहर बैठी रही। साढ़े सात बजे जब होल में डंडा डालकर तेंदुए को हिलाकर देखने की कोशिश की गई तो उसने दहाड़ लगाने के साथ ही अपने पंजों से डंडा खींच लिया। ट्रेंकुलाइज के बाद भी तेंदुए को बेहोश होता न देख रात लगभग पौने आठ बजे उसे दूसरी बार ट्रेंकुलाइज किया गया। फिर से उसके बेहोश होने का इंतजार शुरू हुआ। मगर, इस बार भी उस पर कोई असर नहीं हुआ। हालांकि वह उठ नहीं पा रहा था लेकिन दहाड़े मारने के साथ ही वह इधर-उधर घिसकता रहा। रात 8.25 बजे उसे तीसरी ट्रेंकुलाइज किया गया। दवाएं अब असर दिखाने लगी थीं। लगभग दस मिनट तक हिलने-डुलने के बाद वह अचेत हुआ।
टार्च और मोबाइल की
रोशनी में चला ऑपरेशन
तेंदुए को पकड़ने के लिए टार्च और मोबाइल फोन की रोशनी में ऑपरेशन हुआ। दरअसल, कमरे के जिस हिस्से को तोड़कर तेंदुए को बेहोश किया गया, वहां लाइट की व्यवस्था नहीं थी। ऐसे में रेस्क्यू टीम की टार्च और स्थानीय लोगों मोबाइल फोन की रोशनी में ऑपरेशन को सफलतापूर्वक अंजाम तक पहुंचाया।
घंटों करते रहे अनुमति मिलने का इंतजार
तेंदुए के घर में छुपे होने की सूचना के घंटों बाद उसको पकड़ने की कवायद शुरू हो सकी। कोई कार्रवाई होते न देख स्थानीय लोगों ने कंट्रोल रूम के बाद जिलाधिकारी और एसएसपी को भी फोन पर सूचना दी। मगर, शाम लगभग चार बजे तक न तो वन विभाग की टीम ही पहुंची और न ही वाइल्ड लाइफ की। दरअसल, वन विभाग के अधिकारी वरिष्ठ अधिकारी से अनुमति मिलने के इंतजार में हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे।
बता दें कि तेंदुए वन्य जीव संरक्षण के अधिनियम के शेड्यूल एक में आता है। इस श्रेणी के जीवों को पकड़ने के लिए लखनऊ स्थित चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन से अनुमति लेनी पड़ती है। इससे नीचे के अधिकारियों को इस श्रेणी के जानवरों को पकड़ने की अनुमति देने का अधिकार ही नहीं है। सुरेश नगर में छुपे तेंदुए को पकड़ने के लिए जब प्रशासन की तरफ से स्थानीय वन विभाग के अधिकारियों से संपर्क साधा गया तो उन्होंने तुरंत एक्शन लेने से इनकार कर दिया। इसके लिए वन विभाग के अधिकारियों ने चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन से अनुमति लेने की प्रक्रिया शुरू की। इसमें ही लगभग तीन घंटे गुजर गए। जब उन्होंने हरी झंडी दे दी तब कहीं जाकर वन विभाग के अधिकारी वाइल्ड लाइफ की टीम लेकर मौके पर पहुंचे। बता दें कि कुछ दिनों पहले कुंडौल क्षेत्र में एक लकड़बग्घे को बिना अनुमति के लिए वन विभाग ने पकड़ लिया था, इस पर उनसे तमाम सवाल जवाल हो गए थे। इसी के चलते वे सुरेश नगर में बिना अनुमति के कार्रवाई को तैयार नहीं हो रहे थे।
तेंदुए को बिना उच्च अधिकारियों की अनुमति के पकड़ना हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं है। लखनऊ से अनुमति मिलने में देरी की वजह से ऑपरेशन देर से शुरू हो सका।
राजेश शर्मा, रेंजर, आगरा सिटी