मैनपुरी। नवीन मंडी में भ्रष्टाचार इस तरह हावी है कि दबंगों ने लिखित हलफनामे देने के बाद भी मंडी में कब्जा कर लिया। मंडी प्रशासन के पास व्यापारियों द्वारा जमीन न कब्जाने के हलफनामे मौजूद हैं। इसके बाद भी मंडी प्रशासन असहाय बनकर कब्जा होते देख रहा है।
नवीन मंडी में दुकानें आवंटन के बाद भी व्यापारियों को खरीद के लाइसेंस जारी किए जाते रहे। व्यापारियों को भी इस बात की जानकारी थी कि मंडी में अब दुकानें नहीं बची हैं, ऐसे में कहां बैठकर खरीद करेंगे। फिर भी उन्होंने लाइसेंस के लिए आवेदन किया। इतना ही नहीं, उन्होंने आवेदन के दौरान इस बात का हलफनामा भी दिया कि वे मंडी में जगह की मांग नहीं करेंगे।
इसी शर्त पर मंडी समिति ने इन व्यापारियों को लाइसेंस जारी किया। लाइसेंस जारी होने के बाद व्यापारियों ने मंडी समिति से तो जगह नहीं मांगी, लेकिन खुद ही कब्जा जमाना शुरू कर दिया। हुआ ये कि धीरे-धीरे कब्जों के चलते मंडी में खाली पड़ी जमीन पट गई। किसी ने बांस बल्ली लगाकर मंडी की जमीन पर हक जमाना शुरू कर दिया तो किसी ने पक्की दुकानें बनाकर।
मंडी में एक या दो नहीं, बल्कि दो सैकड़ा से अधिक व्यापारियों ने जमीन पर कब्जा किया है। फिर भी मंडी प्रशासन ने इन पर कोई कार्रवाई नहीं की। अब जब मंडी को खाली कराने के लिए व्यापारी ही आपस में भिड़ गए हैं तो भी मंडी समिति इन कब्जों को नहीं हटवा रही है। आखिर ऐसा क्या है कि मंडी समिति इन कब्जों को नहीं हटवा पा रही है।
क्या मंडी समिति के अधिकारी और प्रशासन कुछ दबंग व्यापारियों के आगे बेबस है या फिर मामला कुछ और है। ये तो कहना मुश्किल है, लेकिन सभी की निगाहें मंडी में चल रहे खेल पर टिकी हुई हैं।
नवीन मंडी परिसर में ही मंडी समित का कार्यालय बना हुआ है। मंडी निरीक्षकों व अन्य कर्मचारियों की जिम्मेदारी होती है कि वे रोजाना मंडी का निरीक्षण कर व्यवस्थाएं देखें। अगर कहीं कोई गड़बड़ी मिलती है, तो वे इसकी सूचना मंडी सचिव को दें, जिससे उन पर कार्रवाई की जा सके। ऐसे में ये सवाल सबसे बड़ा है कि आखिर मंडी निरीक्षकों ने इन कब्जों की जानकारी क्यों नहीं दी। अगर जानकारी दी गई तो ये कब्जे पहले ही क्यों नहीं हटवाए गए।