पड़ोसी राज्यों में फल, सब्जी, किराना की मंडियों में रियायतों की भरमार है तो प्रदेश की मंडियां सरकार का खजाना भरने का जरिया बनाई गई हैं। पड़ोसी राज्यों में महज एक फीसदी मंडी शुल्क वसूला जा रहा है तो प्रदेश भर की मंडियों में यह 2.5 फीसदी है। इसमें दो फीसदी मंडी शुल्क और 0.5 फीसदी सेस है। ढाई गुना मंडी शुल्क वसूलने से किसान और व्यापारी आगरा की मंडी कम आ रहे हैं। इससे माल की आपूर्ति भी कम होती जा रही है।
राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा एक फीसदी मंडी शुल्क ले रहे है तो महाराष्ट्र में यह शुल्क महज 1.05 फीसदी है। उपज को मंडी में बेचने के लिए किसानों को 2.5 फीसदी शुल्क देना पड़ रहा है, जबकि मध्य प्रदेश ने हाल में ही एलान किया है कि वह बासमती धान की बिक्री पर मंडी शुल्क नहीं लेगा। ऐसे ही रियायतों की झड़ी राजस्थान और हरियाणा ने लगाई है।
सिकंदरा सब्जी मंडी के फ्रू ट एंड वेजिटेवल एसोसिएशन महासचिव कन्हैया लाल मानवानी के मुताबिक, मंडी शुल्क में रियायत मिलनी चाहिए। टैक्स एक फीसदी तक ही लिया जाए।
किराना कारोबारी कर चुके विरोध
काजू, बादाम, मैंथा समेत कई चीजों पर मंडी शुल्क लगाने के फैसले के खिलाफ कारोबारी विरोध प्रदर्शन कर चुके हैं। व्यापारियों का कहना है कि जो पैदावार उत्तर प्रदेश में होती ही नहीं है, उन पर शुल्क क्यों लगाया गया है।
शास्त्रीपुरम् पुल पर रात में वसूली
सिकंदरा सब्जी मंडी से आगे शास्त्रीपुरम् फ्लाईओवर मंडी समिति अधिकारियों, कर्मचारियों की वसूली का सबसे बड़ा सेंटर है। वहां रात 10 बजे के बाद मंडी समिति के अधिकारी हाईवे से गुजरने वाले उन ट्रकों से वसूली कर रहे हैं, जो मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल से फल और सब्जियों को लेकर उत्तर भारत के राज्यों या फिर पश्चिमी उत्तरप्रदेश के जिलों तक पहुंच रहे हैं। इंदौर से मुरादाबाद मंडी ले जाई जा रहे प्याज से लदे ट्रक को भी अधिकारियों ने रोक लिया। शमन शुल्क के नाम पर 14,000 रुपये वसूले। व्यापारियों को डर रहता है कि एक दिन भी यदि ट्रक रोक लिया तो लाखों रुपये के फल-सब्जी सड़ जाएंगे। हर रात हाईवे से गुजरने वाले 150 से 200 ट्रकों को वसूली के बाद ही छोड़ा जा रहा है।