एक दौर था जब लोगों को सावन के महीने का बेसब्री से इंतजार रहता था। सावन शुरू होते ही गांव की गलियों से लेकर शहर तक झूले पड़ते थे। सुबह शाम महिलाएं झूला झूलतीं और कजरी गाती थीं। लड़कियां ससुराल से मायके आती थीं लेकिन अब ये परंपरा लुप्त होती जा रही है। न तो झूले पड़ते हैं और न कजरी, मल्हार सुनाई दे रही है।
बोलियों की पहचान गांव तक सिमट गई है। सावन शुरू हो गया है लेकिन इसका एहसास ही नहीं हो रहा है। उमंग और खुमारी का संगम इसी महीने में हरियाली तीज पर खत्म होता था। सखियों को सुख-दुख बांटने, साथ बैठकर मेंहदी लगाने की परंपरा फिर गीत, मल्हार ये सब गुम हो चुका है। बच्चे अब झूले नहीं वीडियो गेम में मस्त रहते हैं। महिला संगठन भी अब किटी पार्टी जैसे आयोजनों तक सीमित हैं।
कहती हैं गृहणियां
सावन के महीने में गांव की बेटियां अपने मायके आती थीं तथा मूसलाधार बारिश के बाद हल्की हल्की बूंदों के बीच ही घर से निकल कर झूले झूलती थीं। मगर अब यह सब कम ही देखने को मिलता है।
- अनीता वर्मा
सावन के महीने में शायद ही कोई घर ऐसा बचता होगा जहां लड़कियों और नवविवाहिताओं को मल्हार गाते न देखा जाता हो, मगर अब सारी बातें किस्से कहानियां रह गई हैं। इसलिए सावन फीका लगता है।
- इंद्रा सहाय
बाग बगीचों में अब सावन के गीत नहीं गूंजते। हरियाली तीज की परंपरा धीरे धीरे कम होती जा रही है और इसी के साथ मल्हारें भीं गुम हो रही हैं।
- डा. श्यामलता वेद
सावन में मायके जाना बेहद पसंद हैं, लेकिन अब परिवार की जिम्मेदारियों के चलते वक्त नहीं मिल पाता। इसलिए सावन बस औपचारिकता तक रह जाता है।
- अंकिता जैन