मथुरा। भगवान श्रीकृष्ण की पटरानी यमुना महारानी के प्राचीन विश्राम घाट के बारे में तो आपने सुना ही होगा। यमुना के इस विश्राम घाट की पवित्रता देश और विदेश में रह रहे करोड़ों श्रद्धालुओं के मन को आनंदित कर देती है। आज हम आपको इस घाट का महत्व, पौराणिकता के साथ ही यह भी बताएंगे कि हजारों साल पुराने इस घाट का नाम आखिर विश्राम घाट क्यूं पड़ा।
यमुना के इस प्राचीन घाट का मनोरम दृश्य श्रद्धालुओं के मन को प्रफुल्लित कर देता है। सुबह और शाम घंटे घड़ियालों के तेज स्वरों के बीच यमुना महारानी की आरती के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं।
कामेश्वर नाथ चतुर्वेदी ने बताया कि वाराह पुराण में यमुना के इस घाट को लेकर उल्लेख है, कहा गया है कि पृथ्वी को लेकर आए भगवान वाराह ने यहीं पर विश्राम किया था। कृष्ण कालीन युग में भगवान श्रीकृष्ण और बलराम ने अपने मामा कंस को मारकर यमुना के इस घाट पर विश्राम किया। इसी के चलते इस घाट का नाम विश्राम घाट पड़ा।
माथुर चतुर्वेद परिषद के महामंत्री राकेश तिवारी ने बताया श्रद्धालु विश्राम घाट पर यमुना महारानी का दुग्ध और जल अभिषेक के साथ पूजा-अर्चना कर चुनरी मनोरथ मनाते हैं। इस मनोरथ में भव्य शोभायात्रा के साथ नावों पर सवार होकर यमुना महारानी को चुनरी ओढ़ाई जाती है।
उधर, यमुना के इस प्राचीन घाट पर यमराज और उनकी बहन यमुना महारानी का एक मात्र मंदिर है। यम द्वितीया पर्व पर यमुना के इसी घाट पर भाई और बहन हाथ पकड़कर स्नान करते हैं और यम की फांस से मुक्ति पा जाते हैं। विश्राम घाट पर तुलादान (शरीर के वजन के बराबर दान) देने का महत्व निहित है। विश्राम घाट की सीढ़ियों के ऊपर संगमरमर पत्थर से बने तुलाद्वार इसके प्रमाण हैं। इसमें सबसे प्राचीन तुलाद्वार ओरछा नरेश वीर सिंह बुंदेला का है इस द्वार का निर्माण सन 1618 में कराया गया।