एटा। निकाय चुनाव को लेकर सियासत तेज है। हर दल ने प्रत्याशी घोषित कर दिया है। वहीं राजनीतिक उठापटक भी तेज है। जातिगत समीकरण भी चुनाव को सीधे तौर पर प्रभावित करते नजर आ रहे हैं। कांग्रेस के प्रदेश सचिव के भाजपा में शामिल होने के बाद नगर पालिका सीट पर स्थितियां बदल चुकी हैं। एक बार फिर 2006 में हुए चुनाव की यादें जेहन को टटोल रही हैं।
गुरुवार को कांग्रेस के प्रदेश सचिव प्रमोद गुप्ता ने भाजपा का दामन थाम लिया। इसका चुनाव में बड़ा फायदा भाजपा को हो सकता है। दरअसल, एटा नगर पालिका सीट पर चुनाव में जातिगत समीकरण खासे मायने रखते हैं। पूर्व के चुनावों नजर डालें, तो वैश्य वर्ग के मतदाताओं का चुनाव में निर्णायक रोल रहा है। इस बार नामांकन से पहले तक प्रमोद गुप्ता की पत्नी माधुरी गुप्ता कांग्रेस से चुनाव मैदान में उतर रही थीं। सपा ने मुस्लिम प्रत्याशी को अपना चेहरा बनाया। जबकि भाजपा ने वैश्य प्रत्याशी को तबज्जो दी। कांग्रेस ने भी वैश्य प्रत्याशी को टिकट दी है। ऐसे में वैश्य मतों का बिखराव होने की प्रबल संभावनाएं हैं।
उधर, मुस्लिम समाज ने पिछले दिनों बैठक करके एक ही प्रत्याशी को चुनाव लड़ाने पर जोर दिया। इसके चलते एक मुस्लिम प्रत्याशी ने बसपा से टिकट से इनकार कर दिया। इसके चलते मुस्लिम वोटर एक पक्षीय होने की संभावनाएं हैं। इसके अलावा बसपा ने ब्राह्मण प्रत्याशी को चेहरा बनाकर नई रणनीति तय की है। वहीं निर्दलीय प्रत्याशी भी चुनाव में पूरी दम से ताल ठोंक रहे हैं। राजनीति विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव में जातिगत समीकरण खासे हावी रहेंगे।
अगर अन्य वर्ग भी एकजुट हो जाता है, तो पूरा परिदृश्य बदल सकता है। विश्लेषक संजीव चौहान कहते हैं कि निकाय चुनाव में जातिगत मुद्दे हावी रहते हैं। ऐसे में यह प्रत्याशियों पर निर्भर करता है कि कौन किस जाति में अपनी जगह कायम कर पाता है? वहीं देखने वाली होगी कि आखिर प्रत्याशी किस प्रत्याशी को तवज्जो देते हैं?
2006 में भी हावी रही थी जातीयता
जिले में वर्ष 2006 में हुए निकाय चुनाव में एटा नगर पालिका सीट पर जातीयता हावी रही थी। राक्रांपा प्रत्याशी और बसपा प्रत्याशी के बीच चल रही टक्कर जातिगत समीकरण पर केंद्रित हो गई थी। इसे लेकर हिंसा और झगड़ों की स्थिति बनी थी। शहर में चार दिन कर्फ्यू की स्थिति रही।