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पूरा नहीं हो सका शहर को सूरत-इंदौर जैसा बनाने का सपना

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फिरोजाबाद। वर्ष 2018 में नगर निगम विवादों से घिरा रहा। शहर के विकास की योजनाएं रफ्तार नहीं पकड़ पाईं। कूड़ा निस्तारण की योजना अधर में लटकी रही। स्वच्छता अभियान धरातल पर कम होर्डिग्स बैनरों में अधिक दिखाई दिया।

पार्षद साल भर हक के लिए लड़ते रहे तो नगर निगम में अधिकारी बेलगाम रहे। नगर में गुटबाजी और सत्ता के दखल के चलते अधिकारी काम छोड़कर छुट्टी पर चले गए। पूरी साल नगर निगम में काम का माहौल नहीं बन सका इससे रोजमर्रा के कामकाज भी प्रभावित हुए।
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गंगा जल ने पानी के संकट को कुछ हद तक दूर किया लेकिन सड़क, गलियों के गड्ढे न भर सके। साफ-सफाई व्यवस्थाएं ध्वस्त रहीं। साल के जाते-जाते डीजल का संकट इतना गहराया कि शहर को सूरत-इंदौर जैसा खूबसूरत बनाने का सपना धरा रह गया।


सत्ता के दवाब में नगर निगम में तैनात नगर आयुक्त, चीफ इंजीनियर, एक्सईएन सहित कई अफसरों ने मैदान छोड़ने में ही अपनी भलाई समझी। शासन-प्रशासन तक मामला पहुंचने के बाद भी कोई अधिकारी लौटकर नगर निगम आने को तैयार नहीं हुआ।

विषम परिस्थिति में डीएम नेहा शर्मा को नगर निगम की कमान संभालनी पड़ी।
केंद्र सरकार की अमृत योजना के तहत पर्यावरण संरक्षण के लिए शहर के पार्कों का कायाकल्प करने के लिए करोड़ों रुपये का बजट दिया गया। पार्कों के सुंदरीकरण को लाखों के टेंडर भी उठाए, लेकिन साल के अंत तक चिन्हित पार्कों में एक भी पार्क के दिन नहीं सुधर सके।


शहर की सफाई व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट तैयार करना वर्ष 2018 में बड़ी चुनौती रहा। केंद्र व प्रदेश सरकार के आदेश के बावजूद नगर निगम प्रशासन सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट तैयार नहीं हो सका। नगरनिगम ने डीआरपी स्वीकृति के लिए शासन को भेजी है, परंतु अभी तक हरी झंडी नहीं मिली।
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नगर निगम के चुनाव को एक साल पूरा गुजर गया। बोर्ड मीटिंग के लिए जीवाराम हॉल में आलीशान सदन बनाने के लिए कवायद शुरू हुई थी, परंतु सदन के नाम पर हॉल की रंगाई-पुताई के बाद उसमें ताला डाल दिया गया। साल के अंत तक सदन का कार्य पूरा नहीं हो सका।
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