शताब्दियों से सूकर क्षेत्र सोरों के तीर्थ पुरोहित देशभर से तीर्थ यात्रा के लिए यहां पहुंचने वाले तीर्थ यात्रियों की वंशावली के लेखन का कार्य करते हैं। भोज पत्रों और ताम्र पत्रों पर वंश लेखन के पश्चात अब कागज की वहियों पर वंश लेखन का कार्य शुरू किया गया। तीर्थ पुरोहितों के पास सैकड़ों वर्ष पुरानी वहियां आज भी सुरक्षित हैं।
तीर्थपुरोहितों की वहियों में देश भर के राजाओं, महाराजाओं, साधू, संतों, राजनेताओं एवं आम लोगों के परिवारों के वंश लेखन वहियों में मौजूद हैं। सोरों में तीस हजार से अधिक की संख्या में वंशावली की वहियां सुरक्षित और संरक्षित हैं। इन वहियों में लेखन करने के लिए अलग स्याही तैयार करके तीर्थ पुरोहित वही लेखन करते हैं, जो काफी वर्षों तक सुरक्षित रहती है। यह वहियां मुड़िया लिपि में लिखीं गईं हैं। इसमेें स्थानीय भाषा का भी प्रयोग है। इन वंशावलियों में जातियों, गोत्रों, उपगोत्रों का भी जिक्र रहता है जो भारतीय संस्कृति और सामाजिक इतिहास का प्रमाण है। सबसे अहम बात इन वहियों में देखने को मिलती हैं कि तीर्थ पुरोहितों ने वही लेखन को भेदभाव से दूर रखा है। जहां राजाओं महाराजाओं की वंशावलियां जिस क्रम में अंकित हैं उसी क्रम में तीर्थ नगरी में पहुंचने वाले अन्य श्रद्धालुओं की हैं। इन वहियों में हिंदू से मुस्लिम बने तमाम परिवारों का ब्यौरा भी मिलता है। तीर्थ श्रद्धालुओं की जाति और गोत्रों के अलावा उनके गांव की परंपराएं, ग्राम देवी, देवता आदि के उल्लेख भी मिलते हैं। विभिन्न राजवंशों की मुद्रांए, हस्त लेखन, दान पत्र, अंगूठे और पंजों के निशान वहियों में मौजूद हैं। जो उनकी नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा बने हुए हैं। सूकर क्षेत्र शोध संस्थान के निदेशक डा. नरेश बंसल ने वंशवलियों पर शोध कार्य किया है। उनका मानना है कि यह वहियां इस तीर्थनगरी के प्रति शताब्दियों से यहां आने वाले श्रद्धालुओं की सनद हैं जो काफी महत्वपूर्ण हैं, जिससे धर्म संस्कृति और श्रद्धा की जानकारी होती है। साहित्यकार डा. आरके दीक्षित का कहना है कि सोरों के तीर्थपुरोहितों की वहियों में काफी महत्वपूर्ण जानकारियां लिपिबद्ध हैं। यह अद्भुत भी हैं।
क्या कहते हैं तीर्थपुरोहित-
तीर्थनगरी में वंशावली लेखन का कार्य काफी प्राचीन है। कत्था को घिसकर विशेष स्याही बनाई जाती है। इससे वंशावली का लेखन किया जाता है। इस प्राचीन तीर्थनगरी को आज तक तीर्थनगरी का दर्जा नहीं मिला। जिस तीर्थ का वर्णन पुराणों में मिलता है- पंडित सोहन लाल मिश्र, तीर्थपुरोहित
- कागज के अविष्कार से पहले की वंश लेखन की परंपरा है। पहले भोज पत्र और ताम्र पत्र पर वंशावली का लेखन होता था। गुरु गोविंद सिंह, राणा सांगा के तीर्थनगरी आगमन के ताम्रपत्र तीर्थपुरोहितों के पास सुरक्षित है। इन वंशावलियों पर शोध और खोज के कार्य भी स्कॉलर करते हैं।
पंडित भारत किशोर दुबे, प्रदेश उपाध्यक्ष राष्ट्रीय ब्राह्मण सभा
- भारत का प्राचीनतम तीर्थ होने का गौरव सोरों सूकर क्षेत्र को है। कई राज्यों के श्रद्धालु तीर्थयात्री यहां आते हैं और वंशावलियों के माध्यम से कई पीढिय़ों के अपने पूर्वजों के ब्यौरे का श्रवण करते हैं। पूर्वजों के स्मरण से उनके परिवारीजनों को आत्मिक सुख अनुभव होता है। ऐसी तीर्थनगरी की उपेक्षा सरकार कर रही है जो ठीक नहीं है।
पंडित दाऊ दयाल चौधरी, तीर्थपुरोहित
- सोरों सतयुगकालीन तीर्थ है। यहां भगवान राम, कृष्ण और पांडवों के आने के भी कई प्रमाण हैं। यहां की वंशावलियों में देश की कई रियासतों के राजाओं के आने के उल्लेख दर्ज हैं। यह तीर्थ पवित्र और महत्वपूर्ण है। इसे अवश्य तीर्थ नगरी का दर्जा मिलना चाहिए।
पंडित श्रीकृष्ण महेरे, तीर्थपुरोहित