‘शिवाजी अपनी व्यवस्था और विचार से आगरा आए और उसी के अनुरूप वापस लौटे। 32 किले एक बूंद खून बहाए बिना जीते। इतिहासकार वामपंथियों के पिछलग्गू बने रहे। शिवाजी का चरित्र हनने के लिए तरह-तरह का इतिहास लिखा। शिवाजी पर लगातार शोध कार्य होने चाहिए। उनके शौर्य का इतिहास हमारे सामने आना चाहिए।
ये बातें इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय संगठन मंत्री डॉ. बालमुकुंद पांडेय ने गुरुवार को आगरा के डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के दीनदयाल उपाध्याय ग्राम्य विकास संस्थान में कही। वह ‘शिवाजी की आगरा यात्रा का एतिहासिक महत्व: स्रोत एवं साक्ष्य’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन सत्र में बोल रहे थे।
पंडित माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जगदीश उपासने ने कहा कि अब तक आगरा में शिवाजी के कई स्मारक बन जाने चाहिए थे। हम अपने वीर पुरुषों और पूर्वजों को भूल गए। वियतनाम में शिवाजी की प्रतिमा लगी है। संकट की घड़ी में वहां के लोगों ने शिवाजी की रणनीति से प्रेरणा ली। इतिहास के तथ्यों को सही कराना होगा, इसके लिए शोध कार्य करना होगा।
संस्कार भारती के संरक्षक पद्मश्री योगेंद्र ने कहा कि शोध हमारी सांस्कृतिक और राजनीतिक विरासत के उजले पक्ष को प्रकाश में लाने का माध्यम है। जरूरत है कि इतिहास के छुपाए गए सत्य को पूरी ताकत से उजागर किया जाए। डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. अरविंद कुमार दीक्षित ने शिवाजी पर शोध कार्य करने के लिए प्रो. सुगम आनंद और डॉ. अमी आधार निडर को बधाई दी। उन्होंने कहा कि इतिहास वह है जिसमें वर्तमान पीढ़ी अपने अतीत से प्रेरणा लेकर अच्छे कार्य करते हुए अच्छे भविष्य का निर्माण करे। मिशन शिवाजी के संस्थापक घनश्याम माथुर ने भी विचार व्यक्त किए। प्रो. सुगम आनंद ने आभार व्यक्त किया। संचालन डॉ. अमी आधार निडर ने किया।
80 शोधपत्र पढ़े गए
दो दिवसीय संगोष्ठी में विषय पर 80 शोध पढ़े गए। तकनीकी सत्र में त्रिपुरा केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बीएल धरुरकर, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के यूए कदम, प्रो. आरके शर्मा ने विचार व्यक्त किया। कार्यक्रम में डॉ. मनोज कुमार सिंह, डॉ. अजय शर्मा, डॉ. आयुष मंगल, डॉ. आभा श्रेयस यादव, डॉ. बीडी शुक्ला, डॉ. लवकुश मिश्रा, प्रो. प्रदीप श्रीधर, डॉ. तरुण शर्मा, डॉ. हेमा पाठक, डॉ. गिरजाशंकर शर्मा, डॉ. जेपी शर्मा की मौजूदगी रही।