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ताज: पसीना और गंदगी से बदला संगमरमर का रंग

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आगरा। हवा में घुले जहर और भारी प्रदूषण के कारण ताजमहल का संगमरमर रंग बदल रहा है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने ताज के पीलेपन को दूर करने के लिए मुल्तानी मिट्टी के लेप वाला मडपैक ट्रीटमेंट किया, लेकिन संगमरमर के अंदर तक पहुंचे प्रदूषित तत्वों के कारण यह धवल नहीं हो पाया।
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एएसआई साइंस ब्रांच ने एक ही दीवार पर दो बार मडपैक ट्रीटमेंट किया, लेकिन यह बेअसर साबित हुआ। अब साइंस ब्रांच के अधिकारी संगमरमर के रंग बदलने का अध्ययन कर रहे हैं। ताज के संगमरमर को मूल रंग में लाने के लिए मडपैक के अलावा अन्य पद्धतियों पर भी मंथन किया गया है।

ताजमहल में शाहजहां और मुमताज महल की कब्रों को देखने के लिए सैलानी मुख्य गुंबद में प्रवेश करते हैं, लेकिन गंदे हाथों से दीवारों, संगमरमर पर उकेरे फूलों और पच्चीकारी को छूते हैं। पसीने और गंदगी के साथ त्वचा से निकले तैलीय पदार्थ अब संगमरमर के अंदर तक पहुंच गए हैं।
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मडपैक से सफाई के बाद भी संगमरमर मूल रंग में नहीं आया तो एएसआई अधिकारियों ने संगमरमर की प्रकृति बदलने का अध्ययन किया। साइंस ब्रांच के अधिकारियों के मुताबिक गुंबद की बाहरी दीवारों पर धूल कण जमा थे, जो मडपैक से साफ हो गए, लेकिन अंदर की दीवारों पर पसीना और तैलीय पदार्थ जमा हैं।

स्टीम थेरेपी के विकल्प पर चल रहा मंथन

कुछ दीवारों पर मडपैक के बेअसर साबित होने पर विशेषज्ञ स्टीम थेरेपी पर चिंतन कर रहे हैं। स्टीम थेरेपी में पानी को भाप बनाकर अलग तरह के साबुन के साथ संगमरमर पर डाला जाएगा, जो पत्थर के अंदर तक पहुंचकर प्रदूषणकारी तत्वों को सतह पर लेकर आएगा।

खास दबाव पर यह भाप संगमरमर में प्रयोग की जाएगी। तेल, पेंट, पसीने, कार्बन कणों को हटाने के लिए यह तकनीक सफल रही है। इस थेरेपी का प्रयोग रोम के कैथोलिक चर्च और अब संसद भवन में दाग हटाने में हो रहा है। ताज में प्रयोग करने पर गुंबद को आम पर्यटकों के लिए बंद करना पड़ेगा।

ताज में सुरक्षित नहीं है लेजर से दाग हटाना

एएसआई अधिकारियों ने लेजर से ताज के दाग हटाने पर भी विचार किया, लेकिन साइंस ब्रांच के अधिकारी लेजर को सुरक्षित नहीं मानते। उनका मानना है कि संगमरमर के बांड तोड़ने के साथ लेजर पत्थर को भी कमजोर करेगा।

टनों वजन वाली दीवारों पर लेजर तकनीक का प्रयोग किया गया तो दीवारों का संगमरमर कमजोर हो सकता है, जिसका दुष्प्रभाव इमारत पर भी पड़ सकता है। लेजर के खतरों के कारण ही आगरा में राधास्वामी मत के प्रथम गुरु की समाधि स्वामीबाग पर इसका प्रयोग नहीं किया गया। विदेशी विशेषज्ञों को बुलाकर भी स्वामीबाग ने लेजर की जगह फिर मडपैक को चुना।
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