मैनपुरी। जिले के एआरटीओ कार्यालय में भी फर्जीवाड़ा होता रहा है। कई बार पुलिस जांच में खुलासा भी हुआ है। पुलिस ने चोरी की गाड़ियां पकड़ी तो फर्जी आरसी भी बरामद हुईं। कोर्ट में लगाए गए लाइसेंस भी फर्जी पाए गए। कुछ मामलों में कार्यालय के कर्मचारियों की संलिप्तता भी उजागर हुई। बावजूद इसके कोई ठोस कार्रवाई आज तक नहीं हो सकी। पड़ोसी जिले इटावा में हुई कार्रवाई का असर सोमवार को जिले के उप संभागीय परिवहन विभाग में देखने को मिला। सोमवार को कर्मचारी नियमानुसार कार्य करते देखे गए।
जनवरी 2012 में औंछा थाना पुलिस ने 10 बोलेरो पकड़ी। सभी बोलेरो का मैनपुरी एआरटीओ कार्यालय से पंजीकरण कराया गया था। पुलिस ने जांच की तो सभी की आरसी फर्जी पाई गईं। पुलिस ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि आखिर फर्जी आरसी जारी कैसे हुईं। पुलिस ने फाइल को बंद कर दिया।
मैनपुरी न्यायालय में जमीन के एक मामले में पहचान के लिए एक पार्टी की ओर से वर्ष 2008 में दो ड्राइविंग लाइसेंस जमा किए गए थे। दूसरी पार्टी की मांग पर वर्ष 2009 में जब जांच कराई गई तो ड्राइविंग लाइसेंस फर्जी पाए गए। इन लाइसेंस को बनवाने के लिए न तो मैनपुरी एआरटीओ कार्यालय में आवेदन हुआ था और न ही सत्यापन हुआ।
मार्च 2014 में फर्जी अभिलेख तैयार करने और जारी करने की सूचना पर एसओजी ने एआरटीओ कार्यालय के एक लिपिक के घर पर छापेमार कार्रवाई की थी। जांच में पुलिस को कई बनी और अधबनी आरसी मिलीं। पुलिस ने इस मामले में कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। लिपिक से पूछताछ की और उसे छोड़ दिया।
वर्ष 2016 में तत्कालीन डीएम लोकेश एम ने एआरटीओ दफ्तर में छापामार कार्रवाई की। जांच में उन्हें दलालों के पास कई फर्जी आरसी और अधिकारियों मुहरें भी मिलीं। साथ ही गोपनीय दस्तावेज भी मिले जो विभाग में ही होने चाहिए थे।
नवंबर 2016 को नोटबंदी के दौरान एआरटीओ दफ्तर में ही कार्यालय के एक लिपिक के पुत्र द्वारा पुराने नोटों को बदलने की शिकायत मिली। इसका वीडियो भी वायरल हुआ था। इस पूरे मामले की जांच एसडीएम को सौंपी गई थी। इस मामले में ठोस कार्रवाई नहीं हुई।