एटा। कहते हैं सत्य परेशान हो सकता है, लेकिन पराजित नहीं। जिले में रविवार को अवैध निर्माण के खिलाफ हुई कार्रवाई में कुछ ऐसा ही हुआ। अवैध निर्माण को लेकर सबसे पहले पहल करने वाले अधिवक्ता कौशल किशोर की आखिरकार जीत हुई। वर्ष 2015 से अब तक उन्होंने हर स्तर पर संघर्ष किया। कई धमकियां भी मिलीं, लेकिन हिम्मत नहीं हारी। रविवार को अधिवक्ता की पहल को लोग सराहते नजर आए।
दरअसल, वर्ष 2015 में कचहरी पर हुए अवैध निर्माण को लेकर अधिवक्ता कौशल किशोर ने सबसे पहले मुद्दा उठाया था। उन्होंने सबसे पहले प्राधिकारी विनियमित क्षेत्र से शिकायत की थी, लेकिन वहां भी मामले को दबा दिया गया। तत्कालीन डीएम ने भी मामले में कोई कार्रवाई नहीं की और सत्ता और प्रशासन दबंगई से दुकानों का निर्माण कराता रहा। जब अधिवक्ता को मायूसी हाथ लगी, तो उन्होंने कोर्ट की शरण ली। हाईकोर्ट में मामला पहुंचा, तो न्यायाधीश ने यूपी रोड साइड कंट्रोल एक्ट के तहत निर्माण को अवैध बताते हुए तत्कालीन डीएम को जांच कर निर्माण ध्वस्त कराने के निर्देश दिए थे। लेकिन सत्ता के दबाव में कोर्ट के आदेश भी धता हो गए।
वर्ष 2017 में सरकार बदली, तो एक बार फिर उम्मीद की किरण जगी। चुनाव के बाद प्राधिकारी विनियमित क्षेत्र से मामले की फिर शिकायत की गई और मामला तत्कालीन डीएम विजय किरन आनंद तक पहुंचा। उन्होंने मामले की जांच की तो अवैध निर्माण मिलने पर तोडने के निर्देश जारी किए गए। जब तक कार्रवाई हो पाती, तब तक डीएम का तबादला करा दिया गया। इसके बाद फाइल फिर दब गई। अब फिर मामले में तेजी आई, तो प्रशासन ने दुकानों के अवैध निर्माण को ध्वस्त कराया। अधिवक्ता कौशल किशोर ने बताया कि सत्य की एक दिन जीत होती है।
अवैध निर्माण को ध्वस्त कराने के काफी संघर्ष किया। कई बार धमकियां भी मिलीं। हमले के प्रयास भी हुए, लेकिन अब लग रहा है कि सत्य परेशान हो सकता है पराजित नहीं। अधिवक्ता की पहल की लोगों ने सराहना की है।
महालेखाकार विभाग की टीम ने घोषित किया था अवैध निर्माण
पिछले साल नगर पालिका में विकास कार्यों की जांच करने आई महालेखाकार विभाग की टीम ने भी दुकानों के निर्माण के नक्शे नहीं मिलने पर निर्माण को अवैध घोषित किया था। जिसमें तत्कालीन पालिकाध्यक्ष को नोटिस दिया गया था।
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आवंटन के नाम पर वसूले गए थे लाखों रुपये
दुकानों के आवंटन के नाम पर दुकानदारों से लाखों रुपये वसूले गए थे। दुकानदारों का आरोप है कि उनको दो लाख रुपये की पर्ची देकर सात से आठ लाख रुपये लेकर कब्जा दिया गया था, लेकिन अब सब डूब गया।