मैनपुरी। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आजादी की जंग छेड़ने वालों में जिले के कई छात्र भी शामिल हैं। इनमें से एक बेवर के जगदीश नारायण त्रिपाठी भी हैं। वे अपनी पढ़ाई छोड़कर आजादी की जंग में कूद पड़े थे। साथ ही बेवर क्रांति में अंग्रेजों के खिलाफ युवाओं को संगठित किया था। मोहल्ला ब्रह्मनान में छह जुलाई 1927 को जन्मे जगदीश नारायण त्रिपाठी को देशभक्ति का जज्बा विरासत में मिला। 14 अगस्त 1942 को थाना बेवर पर तिरंगा फहराने के दौरान पिता जमुना प्रसाद त्रिपाठी की शहादत के बाद वह भूमिगत रहकर सशस्त्र क्रांतिकारी आंदोलन में सक्रिय रूप से जुड़ गए। तिरंगा फहराने वाले क्रांतिकारियों के हुजूम में वह भी शामिल हुए।
बेवर क्रांति में शामिल रहे जगदीश नारायण त्रिपाठी छात्र जीवन में ही स्वतंत्रता समर में कूद गए। क्रांतिकारी योगेश चंद्र चटर्जी, झारखंडे राय, पब्बर राममुक्ति नाथ उपाध्याय, रामाधीन पांडेय के साथ रहकर आजादी की लड़ाई लड़ी। भारत छोड़ो आंदोलन के तहत बेवर में क्रांति की चिंगारी फूटी तो उनके साथ कई युवा और छात्र देश की आजादी की खातिर बगावती हो गए। स्वतंत्रता मिलने तक वह निरंतर अंग्रेजों के खिलाफ युवाओं को संगठित करने के लिए गांव-गांव संपर्क करते रहे। आजादी के बाद कांग्रेस से अलग होकर समाजवादी क्रांति से जुड़े और अंतिम समय तक सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहे। 17 दिसंबर 2011 को उपचार के दौरान लखनऊ में अंतिम सांस ली।
देश आजाद होने के बाद जगदीश नारायण कांग्रेस छोड़कर कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए। कम्युनिस्ट पार्टी की टिकट पर वर्ष 1967 और 1974 में दो बार भोगांव सीट से विधायक रहे। विधानसभा में कम्युनिस्ट विधायक दल के मुख्य सचेतक रहे। देश के प्रमुख कम्युनिस्ट नेताओं के रूप में सोवियत संघ, जर्मन, चेकोस्लाविया, चीन की यात्राएं भी की।
आजादी के बाद भी उनके तेवर बगावती ही रहे। जन समस्याओं का निदान कराने के लिए सरकार के खिलाफ आंदोलन कर वह कई बार जेल गए। साहित्य के क्षेत्र में गहरी रुचि के चलते कई पुस्तकें लिखीं। शहीद स्मारक भवन निर्माण में अहम योगदान देने के बाद आजीवन शहीद स्मारक, शहीद मेला समिति के अध्यक्ष रहे। जन समस्या का निदान कराने को बगावती तेवर वाले जगदीश नरायण त्रिपाठी आजाद भारत में भी किसी के आगे नहीं झुके। जगदीश नारायण को पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने सम्मानित किया। आजादी आंदोलन में भागीदारी करने के दौरान के संस्मरण भी सुने।