एटा। उनकी हर सांस में देशभक्ति का जुनून, आजादी की ललक और भारत मां के सम्मान का साहस था। अंग्रेजी हुकूमत के बीच अपने हक और स्वाभिमान के लिए संघर्ष किया।
जंग ए आजादी में अपना बलिदान देने वालों की लंबी फेहरिस्त में उन्होंने एटा से अपनी वीरता की यात्रा शुरू की। उनकी ही देन है कि हम आजाद भारत में सांस ले रहे हैं। जी हां जिले के वीर सपूतों ने भी अपने जोश और जज्बे से मां भारती के ललाट को ऊंचा किया है। जिले के गांव शाहपुर टहला में जन्मे महावीर सिंह राठौर की कहानी उनकी वीरता को बयां करती है।
वर्ष 1904 में पैदा हुए महावीर सिंह राठौर में बचपन से ही देश प्रेम के संस्कार थे। बचपन में ही उनके जज्बे को अंग्रेजी सल्तनत ने कुचला।
बताया जाता है कि कासगंज में चल रही एक सभा के दौरान महावीर सिंह राठौर ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज बुलंद की और सभा में महात्मा गांधी की जय का नारा लगा दिया था। जिसके बाद अंग्रेजों ने उनको तमाम यातनाएं दीं। यहीं से महावीर की क्रांतिकारी के तौर पर छवि सामने आने लगी। मैट्रिक करने के बाद वे कानपुर चले गए और यहां प्रजातंत्र सेना नामक संगठन का गठन किया।
देश को आजाद कराने के क्रांतिकारी जज्बे के साथ लाहौर चले गए। जहां से उन्हें वर्ष 1929 में लाहौर षड़यंत्र में गिरफ्तार कर लिया गया। इस दौरान हुए असेंबली केस में भगत सिंह और बटकेश्वर दत्त को भी गिरफ्तार कर जेल में डाला गया। जहां महावीर सिंह राठौर ने उनके साथ मिलकर अंग्रेजों के अत्याचार के खिलाफ अनशन शुरू कर दिया। सात अक्तूबर 1930 को कोर्ट ने भगत सिंह और बटकेश्वर दत्त को फांसी और महावीर सिंह राठौर को आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
इसके बाद महावीर सिंह को 1933 में अंडमान निकोबार जेल में काले पानी की सजा में भेज दिया गया। जहां 17 मई 1933 को उनकी मौत हो गई। उनकी शहादत के किस्से आज भी गांव के लोगों की जुबां पर तैरते हैं। गांव शाहपुर टहला में शहीद की प्रतिमा लगी हुई है। जहां आजादी के जश्न के साथ वीर क्रांतिकारी सपूत को याद किया जाता है। जिले के गौरव महावीर सिंह राठौर की कुर्बानी पर आज भी जिले के लोगों को नाज है।