क्रय केंद्र पर धान तौलते मजदूर।
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मैनपुरी। चुनावी माहौल में सरकारी खरीद केंद्रों पर धान खरीद पिछड़ गई है। लक्ष्य के सापेक्ष अभी तक केवल 18 प्रतिशत ही खरीद हो सकी है। सरकारी केंद्रों की बजाए धान बेचने के लिए किसान की पहली पसंद मंडी बनती जा रही है। धान खरीदने के लिए बनाए गए खरीद केंद्रों पर किसानों के नहीं आने से सन्नाटा छाया रहता है।
जिले में धान खरीद के लिए 15 सरकारी खरीद केंद्र बनाए गए हैं। जिनमें खाद्य विभाग के पांच, पीसीएफ के छह, यूपी स्टेट एग्रो के दो, भारतीय खाद्य निगम के दो खरीद केंद्र शामिल हैं। इन केंद्रों पर धान खरीद का 4640 मीट्रिक टन का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
इस लक्ष्य के सापेक्ष अभी तक केवल 17.93 मीट्रिक टन की ही खरीद हो सकी है। चुनावी माहौल में धान बेचने के लिए किसान कम ही बाजार में आया है। जो किसान आए भी हैं उनकी पहली पंसद सरकारी खरीद केंद्र की बजाए मंडी ही रहे हैं।
मंडी में किसान आढ़तिया को धान बेचने में सहूलियत महसूस करते हैं। किसान को मंडी में धान की फसल बेचने पर आढ़तिया से तत्काल रुपया मिल जाता है। जबकि सरकारी केंद्र पर धान बेचने के बाद उसके खाते में आरटीजीएस के माध्यम से रूपया भेजा जाता है।
किसान सरकारी धान खरीद केंद्र की बजाए मंडी में धान बेचने को वरीयता दे रहे हैं। किसानों को सरकारी धान खरीद केंद्रों पर धान बेचने में परेशानी होती है। कई दिनों तक केंद्रों पर धान रखने के बाद जब नंबर आता है तो कभी वारदाना का अभाव तो कभी खरीद के नियमों को पूरा नहीं कर पाने पर किसानों को खरीद केंद्रों से वापस मंडी आकर धान बेचना पड़ता है।
जिसके चलते किसान सीधे मंडी में ही धान बेचने को वरीयता दे रहे हैं। मंडी में धान बेचने पर आढ़तिया नगद भुगतान करते हैं जबकि सरकारी केंद्रों से होने वाले भुगतान का रुपया खाते में आते आते 15 दिन से लेकर एक महीने से अधिक तक का समय लग जाता है। आढ़तिया किसानों को जरुरत के हिसाब से फसल बेचने से पहले ही रुपये दे देते हैं। जिसके चलते मंडी में जगह जगह आढ़त के बाहर धान के ढ़ेर लगे रहते हैं जबकि सरकारी खरीद केंद्रों पर किसान के नहीं आने से सन्नाटा पसरा रहता है।