फिरोजाबाद। पटाखों की आवाज से ध्वनि प्रदूषण होता है, जो वैज्ञानिकों के अनुसार बम जैसा घातक हो सकता है। इससे कान की बीमारियां बढ़ती हैं। कई लोग बहरे हो जाते हैं। प
टाखों की चिंगारियों से कई जानवरों को चोट पहुंचती है, कई बार तो वे पटाखों से घायल हो जाते हैं या मर जाते हैं। पटाखों से सबसे ज्यादा पक्षियों और जानवरों को परेशानी होती है, क्योंकि वे पटाखे की तिगुनी आवाज सुनते हैं। पटाखे प्रतिवर्ष प्रदूषण बढ़ाने में मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं।
पटाखों को जलाने पर सबसे बड़ी समस्या प्रदूषण की होती है। ज्वलनशील एवं ध्वनिकारक पटाखों के उपयोग के कारण वायु की गुणवत्ता एवं ध्वनि स्तर में प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है तथा मानव अंगों पर भी दुष्प्रभाव पड़ता है और कुछ पटाखों से उत्पन्न ध्वनि की तीव्रता 100 डेसीबल से भी अधिक होती है।
प्रदूषण इस दिन खतरे के निशान से काफी ऊपर चला जाता है। तरह-तरह की जहरीली गैसों से वायुमंडल भर जाता है। सांस के जरिए फेफड़ों तक जाने वाली यह हवा शरीर को बहुत नुकसान पहुंचाती है।
जिला अस्पताल के सीएमएस डा. राजीव अग्रवाल का कहना है कि पटाखों में प्रयोग होने वाले रसायन धुएं के जरिए सांस के रास्ते खून में पहुंचकर लीवर व किडनी को नुकसान पहुंचा सकते हैं। अगर अधिक धुआं शरीर में चला गया तो उसके रसायन विभिन्न अंगों में जमा होकर गंभीर नुकसान पहुंचाते हैं। अनिद्रा व चिड़चिड़ाहट की शिकायत बढ़ती है। बेचैनी, घबराहट, उच्च रक्तचाप, तनाव व अवसाद के मामलों में भी इजाफा होता है।