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पिपराघाट पुल रेलवे की हरी झंडी के इंतजार में नहीं हो रहा चालू

Tue, 16 Jul 2013 05:33 AM IST
Lucknow
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लखनऊ । राजधानी लखनऊ से छूटकर बाराबंकी जाने वाली ट्रेनों में दिलकुशा पहुंचते ही ब्रेक लग जाता है। पिपराघाट पुल को पार करते समय ट्रेनों की गति 40 से घटाकर 20 से 30 किलोमीटर प्रति घंटा हो जाती है। संरक्षा मानको को ध्यान में रखते हुए इस सात दशक से अधिक पुराने लोहे के पुल पर ट्रेनों को धीमी गति से चलाने के आदेश हैं। लेकिन आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि ठीक इसी के बगल में पांच साल से एक नया पुल बनकर तैयार है लेकिन रेलवे की हरी झण्डी के इंतजार में उस पर से गाड़ियों का संचालन नहीं हो रहा है। दरअसल लखनऊ-बाराबंकी रेलखंड पर प्रतिदिन 80 ट्रेनें इस पुराने लोहे के पुल से गुजरती हैं। पुल से धीमी गति से गुजरते हुए भी ट्रेनों की आवाज दूर तक सुनायी पड़ती है। रेलवे के इस पुराने पुल की ऊंचाई गोमती नदी से कम होने के कारण बाढ़ के समय इसक ा पानी पुल को छूने लगता है। ऐसे में लगातार कमजोर हो रहे इस पुल पर पहले से ट्रेनों को धीमी गति से चलायी जा रही थी। राज्य सरकार ने यात्रियों की सुरक्षा के लिए पिपराघाट के लोहे के पुल के ठीक बगल में नया पुल बनाने का प्रस्ताव रेलवे के सामने 2003 में रखा था। इस पर वर्ष 2004 में बोर्ड मुख्यालय ने राज्य सरकार से करीब 750 मीटर लंबे पुल के लिए दस करोड़ रुपये मांगे थे। राज्य सरकार से पुल बनाने की लागत मिलने के बाद 2005 में इसका निर्माण रेलवे की निर्माण इकाई ने शुरू किया था। वर्ष 2008 में पुल बनकर तैयार हो गया। इस पुल पर 2009 में ही दिलकुशा से गोमतीनगर वाले छोर तक करीब एक किलोमीटर लंबी लाइन डाल दी गई। इसके बाद से दिलकुशा केबिन से नॉन इंटरलॉकिंग कर पुल की नई लाइन को शुरू करने के लिए इंजीनियरिंग अनुभाग और रेल विद्युतीकरण का कनेक्शन करने के लिए रेलवे का विद्युत अनुभाग उत्त्तर रेलवे लखनऊ मंडल प्रशासन से मेगा ब्लॉक मांग रहा है। ट्रेनों का संचालन प्रभावित न हो इसके लिए रेलवे दो दिन का मेगा ब्लॉक देने को राजी नहीं हो रहा है। पांच साल से दस करोड़ रुपये पानी में डूब रहे हैं।
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