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अपने मिले तो भूल गए सारे गम

Sun, 23 Jun 2013 05:30 AM IST
Lucknow
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लखनऊ। उत्तराखंड की विपदा में फंसे लोग जब शनिवार को दून एक्सप्रेस और उपासना एक्सप्रेस से लखनऊ पहुंचे तो सभी के चेहरों पर आपदा का खौफनाक मंजर साफ झलक रहा था। हालांकि अपनों को सकुशल देख्ा सभी ने ईश्वर के साथ सेना के जवानों को धन्यवाद दिया। चारबाग स्टेशन पर बेहद भावुक माहौल में परिजन एक-दूसरे से गले मिलते हुए दिखाई दिए। ठाकुरगंज की मिथलेश द्विवेदी आठ महिलाओं के साथ चार धाम यात्रा पर गई थी। गंगोत्री और यमनोत्री की पूजा-अर्चना के बाद सभी केदारनाथ के दर्शन के लिए रवाना हो गए। रविवार को केदारनाथ से एक किलोमीटर पहले रामपुरा पर अचानक तेज बारिश शुरू हो गई। जान बचाने के लिए सभी लोग जंगल में छिप गए। भूखे-प्यासे दो रात जंगल में गुजारने के बाद बुधवार को सेना के जवान पहुंचे और उन्होंने खाने के पैकेट दिए और वहां से बाहर निकाला। बस किसी तरह जान बची और वापस अपने घर को आ गए। देवरिया के रत्नेश त्रिवेदी ने बताया कि उनके नौ साथी 15 जून को केदारनाथ पहुंचे थे। त्रासदी के बाद उत्तराखंड सरकार ने राहत पहुंचाने के कोई उपाय नहीं किए। न तो यहां खाने का इंतजाम है और न ही दूसरी सुविधाएं दी जा रही है। यहां करीब 25 सौ लोग फंसे हुए हैं। छत से गिर रहे बारिश के पानी से जैसे-तैसे प्यास बुझा रहे हैं। हेलीकॉप्टर से पानी की बोतलें गिराई जा रही हैं, लेकिन नीचे गिरते ही वह टूट जाती हैं। भूख और प्यास से महिलाओं और बुजुर्गों की मौत हो रही है। चौपटिया निवासी एसवी सिन्हा के रिश्तेदार अरविंद श्रीवास्तव केदारनाथ में महाऋषि सेवा संस्थान में काम करते हैं। पानी में उनका कार्यालय भी बह गया। उनका भी कोई पता नहीं चला। अरविंद श्रीवास्तव की पत्नी संध्या श्रीवास्तव और दो बच्चे उत्कर्ष व पूजा आपदा में फंस गए थे। एसवी सिन्हा वहां पहुंचकर उनको सही सलामत लखनऊ ले आए, लेकिन अब भी बच्चे पिता का पता न चलने पर मायूस हैं। लखनऊ के अमित पंकज की रिश्तेदार रिचा सिन्हा और उनके बच्चे भी केदारनाथ में फंस गए थे। उनका सारा सामान बह गया। जान बचाकर किसी तरह वह बच्चों को वहां से सुरक्षित निकाल सकी। उनके जेहन में सदमे का असर इस कदर समा गया कि जरा सा बोलने मात्र में ही फफक उठती है। मानस विहार के बीके तिवारी सात लोगों के साथ दर्शन करने गए थे। गौरीकुंड के पास मूसलाधार बारिश हो रही थी। सड़क टूटकर गिर गई। बिना भोजन के ही एक स्थान पर कई दिन पड़े रहे। सेना की मदद से किसी तरह लखनऊ आ गए।
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