लखनऊ। गौतम बुद्ध प्राविधिक विश्वविद्यालय (जीबीटीयू) में सक्रिय सॉल्वर गैंग के रहनुमा खुद पर आंच आती देख जांच निपटाने में लग गए हैं। गैंग के खुलासे में सक्रिय भूमिका निभाने वाले प्रतिकुलपति प्रो. डीएस यादव को किनारे लगाने की तैयारी हो गई है। प्राविधिक शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव ने कुलपति को आदेश दिया है कि वे प्रतिकुलपति की नियुक्ति को स्थगित कर दें। प्रमुख सचिव ने जिस नियम का उल्लेख करते हुए आदेश जारी किया है, उसमें आदेश जारी करने की उनका अधिकार भी सवालों के घेरे में है। जीबीटीयू के सांविधिक कॉलेज इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (आईईटी) के कई छात्रों की पिछले रविवार को हुई राज्य प्रवेश परीक्षा में मुन्नाभाई के रूप में संलिप्तता पाई गई थी। पुलिसिया जांच में आईईटी के शिक्षकों और जीबीटीयू के अंदर के लोगों की भी भूमिका सामने आई है। इसे देखते हुए जीबीटीयू के कुलपति प्रो. आरके खांडल ने प्रतिकुलपति के साथ मिलकर मामले में सक्रियता दिखाते हुए जांच कमेटी गठित करने का फैसला किया। अहम बात यह है कि 24 अप्रैल को जांच कमेटी के नाम तय हुए और उसी दिन शासन से प्रतिकुलपति की नियुक्ति प्रक्रिया पूरे न होने का हवाला देकर उसे स्थगित करने का आदेश आ गया। चौंकाने वाली बात यह है कि प्रतिकुलपति की नियुक्ति कुलपति ने एक महीने पहले की थी लेकिन शासन को नियम का ध्यान तब आया जब सॉल्वर गैंग के मामले में जांच तेज होने लगी। नीयत पर सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं क्योंकि मुख्यमंत्री का विभाग होने के बावजूद भी राजधानी में हुए फर्जीवाड़े के इस खेल में प्राविधिक शिक्षा विभाग के आला अफसरों ने एक बार भी जीबीटीयू से कोई जानकारी लेने की जहमत नहीं उठाई। सूत्रों का कहना है कि इस कार्रवाई में जीबीटीयू के ही एक अधिकारी की भूमिका सवालों के घेरे में है। प्रमुख सचिव ने यूपीटीयू अधिनियम 2000 की धारा 36 ए में प्रदत्त अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए प्रतिकुलपति की नियुक्ति को कार्यपरिषद का अनुमोदन प्राप्त करने तक स्थगित करने का आदेश दिया है। जानकार बताते हैं कि इस धारा के अंतर्गत शासन को केवल नीतिगत मामलों में विश्वविद्यालय को निर्देश जारी करने का अधिकार है, आदेश जारी करने का नहीं। दूसरा सवाल यह भी उठ रहा है कि प्रतिकुलपति की नियुक्ति प्रशासनिक मसला है न की नीतिगत। अधिनियम में लिखा गया है कि प्रतिकुलपति कुलपति के प्रसाद पर्यंत पद धारण करेगा। पहले भी जीबीटीयू में प्रतिकुलपति की नियुक्ति करके कार्यपरिषद से अनुमोदन की परंपरा रही है। इस बार जांच के बीच में शासन की कार्रवाई बढ़ाने के बजाय अटकाने में दिखी सक्रियता कहीं न कहीं इस बात का संकेत है कि मामले में फंसे लोगों का रसूख काफी ऊंचा है।