लखनऊ। उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी की अवध संध्या ‘संगम’ शुक्रवार को चंदन दास की गजलों और भजनों से सजी। श्रोताओं से खचाखच भरे अकादमी प्रेक्षागृह में देर तक फरमाइशों का दौर चलता रहा। संध्या में शौकीनों ने गजल के साथ भजनों का भी खूब लुत्फ उठाया। गजल के प्रेमियों में चंदन अपनी कुछ खास गजलों के लिए जाने जाते हैं, लेकिन इस संध्या को लखनऊ की गंगा-जमुनी तहजीब से जोड़ने के लिए उन्होंने गजलों के साथ कुछ भजन भी सुनाए। चंदन दास ने कार्यक्रम की शुरुआत ‘राम तुम्हारा धाम छोड़कर और कहां मैं जाऊं ...’ तथा ‘हमें तो प्यारे हैं श्रीराम...’ भजन से की। इसके बाद उन्होंने गजलें सुनाना शुरू किया तो ज्यादातर शेर तालियों की गूंज के साथ समाप्त होते रहे। शुरुआत इब्राहिम अश्क की गजल ‘खुदा का जिक्र करें या तुम्हारी बात करें, हमें तो इश्क से मतलब किसी की बात करें..’ से करते हुए वे अपनी एक और लोकप्रिय गजल ‘ना जी भर के देखा, ना कुछ बात की, बड़ी आरजू थी मुलाकात की..’ पर आए जो बशीर बद्र की थी। इसी प्रकार अपनी एक और लोकप्रिय गजल ‘अपना गम ले के कहीं और ना जाया जाए...’ को भी उन्होंने अपने चिरपरिचित अंदाज में सुनाया, जो निदा फाजली की थी। इसके प्रसिद्ध शेर ‘घर से मंजिल है बहुत दूर चलो यूं कर लें, किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए...’ पर खूब तालियां बजीं। मिर्जा गालिब की गजल ‘हुस्ने गम...’ भी प्रभावपूर्ण रही तो उन्होंने फरमाइश पर ‘साथ छूटेगा कैसे मेरा आपका...’ भी सुनाया। तबले पर सुभाष शर्मा ने अच्छी संगत की।