देश के ग्रामीण इलाकों में अक्सर देखा गया है कि महिलाओं को यदि कोई शारीरिक बीमारी होती है तो वो महिला डॉक्टर के पास जाना ज्यादा पसंद करती हैं उसका सबसे बड़ा कारण उनका सहजता से अपनी समस्या समझा पाना रहता है।
ऐसा ही महिलाओं के द्वारा अपनी शिकायत महिला थाने में दर्ज कराना ज्यादा सहज दिखाई देता है वो अपनी बात महिला पुलिस से ज्यादा आसानी से कर पाती हैं। मुझे याद है कुछ समय पहले मैं पास के सरकारी अस्पताल में किसी काम से गई थी। वहां एक 10-12 साल की उदास, निढाल, डरी सहमी सी बच्ची एक महिला पुलिस कर्मी से कभी कुछ बात करती, कभी उसके कांधे से लग जाती ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वो उसकी बहुत नजदीक हो, पास ही खड़ा एक व्यक्ति पानी की बोतल हाथ में लिए बार-बार उस महिला पुलिस से उसे पानी देने के लिए पूछ रहा था। वो बच्ची उस व्यक्ति की तरफ कम ही देख रही थी।
शायद वो उस बच्ची का पिता था। मैंने कुछ देर बाद उस महिला पुलिस कर्मी से पूछा - क्या हुआ है इसे? क्या ये बच्ची आपकी कोई जानकार है? उसने मुझे उत्तर दिया- नहीं! मैं इस बच्ची को नहीं जानती। मैं बस अपनी ड्यूटी कर रही हूं। शायद इस बच्ची के साथ कुछ गलत हुआ है।
इसका मेडिकल टेस्ट होना है हम सभी इसीलिए यहां उपस्थित हैं। मैं स्तब्ध थी उस बच्ची को देख जो अपने पिता में एक पुरुष और उस अंजान पुलिस कर्मी में अपनी सी एक महिला की तलाश में सहज होने की कोशिश कर रही थी। उस बच्ची के उदास चेहरे में महिला पुलिस कर्मी के प्रति सहजता साफ देखी जा सकती थी। उस दिन ऐसा आभास हुआ की महिला पुलिस कर्मियों की संख्या में बढ़ोतरी महिलाओं के प्रति अपराध को कम करने में मील का पत्थर साबित हो सकता है।
वैश्विक राजनीति के परिवेश में महिलाओं की बढ़ती भूमिका कई नये आयाम स्थापित कर रही है, जो सामाजिक न्याय व्यवस्था के बेहतर भविष्य की आधारशिला हो सकती है। वर्षों से शक्ति, सहभागिता और सत्ता का गठजोड़ सामाजिक परिवर्तन का आधार बना है। सत्ता के समीकरण को साधने में अहम हिस्सेदार देश की महिलाएं रही हैं जो कई बार देश में किंग मेकर का काम करती हैं परंतु सत्ता में उनकी हिस्सेदारी न के बराबर ही है।
समाज के कई अहम मुद्दों के समाधान में अपने जुझारू व्यक्तित्व का परिचय देने के बाद भी, देश की राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों का रुझान अब तक महिलाओं को महिला वोट बैंक से ज्यादा ऊपर नहीं उठा सका है।
इसके अलग अलग कारण हो सकते हैं लेकिन वर्तमान समय में महिलाओं से संबंधित समस्याओं का समाधान ढूंढने के लिए हमें कई मुद्दों पर खुल कर बात करनी होगी। जिनसे देश की आधी आबादी राजनीति में अपनी बराबर की दावेदारी पेश कर पाए। तभी सही मायने में महिलाओं से जुड़े शिक्षा, समाज, सुरक्षा, आत्मनिर्भरता जैसे मुद्दे हल हो पाएंगे।
देश आजादी के 75 साल का जश्न मना रहा है। आजादी के 75 साल बाद समाज में क्रांतिकारी बदलाव देखे जा सकते हैं। महिलाएं बढ़ चढ़ कर रोजगार में सहभागी बन रही हैं। महिलाएं मजदूर भी हैं और रिक्शा चालक भी साथ ही सरकारी नौकरी से सेना तक में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुकी हैं लेकिन उनका प्रतिनिधित्व बहुत कम है।
इससे उनकी समस्याएं जो पहले घर में ही दफन हो जाती थी अब बाहर खुलकर तो आ रही हैं लेकिन समाधान की दहलीज पर आकर सिमट जा रही हैं जिस तरह से उनका निराकरण होना चाहिए वह नहीं हो पा रहा है। महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध का ग्राफ इस बात की गवाही देता है यदि समाज और सरकार को महिलाओं की समस्या का पुख्ता हल ढूंढना है तो समय रहते देश में महिलाओं का शिक्षा, व्यवसाय, सिविल सेवा, सेना और संसद में प्रतिशत बढ़ाना होगा।