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Rise Of BRICS: अमेरिकी एकाधिकार के खिलाफ शंखनाद करता ब्रिक्स, क्या सच में बदलेगा वैश्विक राजनीति का चेहरा?

Fri, 01 Nov 2024 06:46 PM IST
संकल्प सिंह यूटिलिटी डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

BRICS 2024 सम्मेलन में अमेरिका और पश्चिमी देशों को चुनौती देने के लिए बहु ध्रुवीय विश्व व्यवस्था (Multi Polar New World Order) बनाए जाने पर जोर दिया गया। यही नहीं वैश्विक अर्थव्यवस्था में अमेरिकी डॉलर ने जो अपना प्रभुत्व कायम कर रखा है उसके खिलाफ बगावत (De Dollarization) के रूप में भी इस साल के ब्रिक्स सम्मेलन को देखा जा रहा है।
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BRICS - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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अमेरिका के पूर्व सेक्रेटरी ऑफ स्टेट हेनरि किसिंगर (Henry Kissinger) ने कहा था - "Each success only buys an admission ticket to a more difficult problem" हर सफलता बड़ी परेशानियों में ले जाने का काम करती है। 22 से 24 अक्तूबर के बीच रूस के कजान शहर में आयोजित 16वें ब्रिक्स सम्मेलन की सफलता शायद आने वाले समय में वैश्विक राजनीतिक स्तर पर कई नए दांव-पेंच शुरू करवा सकती है।

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इस साल का ब्रिक्स सम्मेलन कई मायनों में खास है। सम्मेलन में अमेरिका और पश्चिमी देशों को चुनौती देने के लिए बहु ध्रुवीय विश्व व्यवस्था (Multi Polar New World Order) बनाए जाने पर जोर दिया गया। सम्मेलन से जो नई बातें सामने निकलकर आई हैं उसके बाद ब्रिक्स को अब अमेरिका और पश्चिमी देशों द्वारा जो वर्ल्ड ऑर्डर तैयार किया गया है उसके विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। यही नहीं वैश्विक अर्थव्यवस्था में अमेरिकी डॉलर ने जो अपना प्रभुत्व कायम कर रखा है उसके खिलाफ बगावत (De Dollarization) के रूप में भी इस साल के ब्रिक्स सम्मेलन को देखा जा रहा है। इसी कड़ी में आइए जानते हैं ब्रिक्स और उसका महत्व क्या है? क्यों इसे अमेरिका और पश्चिमी देशों द्वारा तैयार की गई विश्व व्यवस्था के विरुद्ध देखा जा रहा है? और रूस के लिए इस साल का ब्रिक्स सम्मेलन क्यों खास है? 

क्या है ब्रिक्स?

साल 2001 में जिम ओ नील ने BRIC नाम के एक खास टर्म को कॉइन किया। उनके मुताबिक ब्राजील, रूस, चीन और भारत की अर्थव्यवस्था तेज रफ्तार से आगे बढ़ रही है। आने वाले सालों में ये देश ग्लोबल इकोनॉमी को शेप करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। अगर ये देश साथ आ जाएं तो नई विश्व व्यवस्था को आकार देने में एक महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। इसके बाद साल 2006 में ब्राजील, रूस, चीन और भारत ने मिलकर ब्रिक "BRIC" ग्रुप बनाया। वहीं साल 2010 में इसमें साउथ अफ्रीका के जुड़ने के बाद इस ग्रुप का नाम BRICS हो गया। ब्रिक्स का उद्देश्य दुनिया की तेजी से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था वाले देशों को साथ लाकर अमेरिका और पश्चिमी देशों को आर्थिक और राजनीतिक स्तर पर चुनौती देना है।  

रूस के लिए BRICS की कूटनीतिक अहमियत

यूक्रेन में रूस के आक्रमण के बाद से उसे पश्चिमी देशों द्वारा वैश्विक स्तर पर बहिष्कार करने की कोशिश लगातार की जा रही है। रूस की अर्थव्यवस्था को चौपट करने के लिए उसे स्विफ्ट अंतर्राष्ट्रीय पेमेंट प्राणाली से बाहर कर दिया गया। यही नहीं राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय ने गिरफ्तारी वारंट भी जारी किया गया। इस कारण वे कई देशों में यात्रा नहीं कर सकते हैं। इसी वजह से उन्होंने पिछले साल ब्रिक्स सम्मेलन में भाग नहीं लिया। इसके अलावा वे इस साल ब्राजील में होने वाले G20 शिखर सम्मेलन में भी भाग नहीं ले पाएंगे।

ऐसी कठिन परिस्थिति में जब दुनिया के कई चुनिंदा देश रूस की घेराबंदी करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में ब्रिक्स सम्मेलन की मेजबानी करना जियोपॉलिटिकल स्टेज पर रूस के लिए कई मायने रखता है। यह प्रतीकात्मक स्तर पर पश्चिमी देशों के मुंह पर करारा तमाचा है। रूस ने इस सम्मेलन को आयोजित करके साफ स्पष्ट शब्दों में अमेरिका और पश्चिमी देशों को यह संकेत दिया कि उन्होंने ही केवल दुनिया की ठेकेदारी नहीं ली है। वैश्विक तेल उत्पादन (Global Oil Production) का 30 प्रतिशत और ग्लोबल जीडीपी का लगभग 35 प्रतिशत (In Terms Of Purchasing Power Parity PPP) कंट्रोल करने वाले देश आज भी उसके साथ हैं। 

वर्ल्ड एनर्जी मार्केट पर BRICS का बढ़ता प्रभाव

विश्व व्यवस्था का ज्यादातर ढांचा अमेरिका और पश्चिमी देशों के हितों को ध्यान में रखकर काम करता है। लंबे समय से कई देश अमेरिका और पश्चिमी देशों के निहित काम करने वाली पक्षपात संस्थाओं के खिलाफ आवाज उठाते रहे हैं। ऐसे में 22 से 24 अक्तूबर के बीच कजान शहर में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन में इस पक्षधर विश्व व्यवस्था को नए सिरे से गढ़ने की वाजिव संभावनाएं व्यक्त की गई हैं।  

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BRICS वैश्विक राजनीति में एक प्रभावशाली समूह बनकर उभरा है। कई पश्चिमी देशों को यह डर है कि G7 का एक प्रतिद्वंद्वी उभर रहा है जो कि G20 के कामकाज और उसकी प्रणाली को प्रभावित कर सकता है। यही नहीं ग्लोबल साउथ के लगभग तीन दर्जन देश इसमें शामिल होना चाहते हैं। 

ब्रिक्स सम्मेलन में इस साल इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब (कंफर्मेशन अभी बाकी है), इजिप्ट और यूएई को शामिल किया गया। जियोपॉलिटिकल स्टेज पर इन देशों के ब्रिक्स में शामिल होने के कई बडे़ मायने छिपे हैं। सऊदी अरब, ईरान और यूएई दुनियाभर में बड़े पैमाने पर ऊर्जा निर्यात करते हैं। यही नहीं रूस के बाद दुनिया का दूसरा सबसे ज्यादा नेचुरल गैस रिजर्व ईरान के पास है। दोनों देशों के नेचुरल गैस रिजर्व को मिला दिया जाए तो इनकी कुल हिस्सेदारी दुनियाभर के नेचुरल गैस रिजर्व में करीब 41.5 प्रतिशत है। दुनिया अब स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में आगे बढ़ रही है। ऐसे में ब्रिक्स देशों के पास भारी मात्रा में नेचुरल गैसों का भंडार का होना बहुत बड़ी कूटनीतिक जीत हो सकती है।

आज के समय वर्ल्ड एनर्जी मार्केट में पश्चिमी देशों के नियम कायदे चलते हैं और उन्हीं के मुताबिक नीतियां बनाई जाती हैं। ऐसे में ब्रिक्स देशों ईरान, यूएई, और रूस के पास तेल और नेचुरल गैस रिजर्व का भंडार होना ब्रिक्स के लिए बहुत बड़ी कूटनीतिक जीत है। इससे वर्ल्ड एनर्जी मार्केट में पश्चिमी देशों के प्रभुत्व को कम करने में बहुत बड़ी मदद मिल सकती है। यही नहीं इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था और राजनीतिक ढांचे में पश्चिमी देशों का जो प्रभुत्व कायम हो रखा है उसको चुनौती देने में भी मदद मिलेगी।

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BRICS - फोटो : PTI

डॉलर के खिलाफ बगावत

आज के समय ग्लोबल ट्रेड, इंटरनेशनल ट्रांजैक्शन, ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम में डॉलर की बहुत बड़ी भूमिका है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में ऑयल ट्रेडिंग, से लेकर कई दूसरी चीजों की खरीदारी आप सिर्फ डॉलर से ही कर सकते हैं। इस कारण अपनी फॉरन पॉलिसी को निर्धारित करने में अमेरिका डॉलर का इस्तेमाल एक टूलकिट के रूप में करता है। कोई दूसरा देश अगर अमेरिका द्वारा बनाए गए नियमों के मुताबिक नहीं चलता तो उस पर सैंक्शन्स लगा दिए जाते हैं। ये सैंक्शन्स फाइनेंशियल बॉम्ब होते हैं जो उस देश को आर्थिक स्तर पर बर्बाद करने का काम करते हैं।

आज के समय ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम में डॉलर जिस तरह से एम्बेड है। ऐसे में किसी देश के ऊपर यूएस के सैंक्शन्स लगने के कई विनाशकारी प्रभाव देखने को मिलते हैं। यही नहीं कई बार जब अमेरिका को लगता है कि कोई देश उसकी नीतियों के खिलाफ जा रहा है तो वह उसके इंटरनेशनल डॉलर और एसेट को भी फ्रीज कर देता है और उसी एसेट्स का इस्तेमाल उस देश के खिलाफ करता है। 

इसी वजह से लंबे समय से कई देशों को अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में डॉलर के वैकल्पिक करेंसी की तलाश रही है। कजान में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन में डॉलर के वैकल्पिक करेंसी को कैसे इंटरनेशल ट्रेड में समायोजित किया जा सकता है? इस विषय पर गहन रूप से चर्चा की गई। इसके अलावा सम्मेलन में एक कॉमन ब्रिक्स करेंसी के ऊपर भी विचार किया गया। कजान डिक्लेरेशन में ब्रिक्स क्रॉस बॉर्डर पेमेंट सिस्टम की बात की गई जो कि आने वाले समय में स्विफ्ट इंटरनेशनल बैंकिंग सिस्टम का विकल्प बन सकता है। इसे समझने से पहले आइए समझते हैं क्या है स्विफ्ट बैंकिंग प्रणाली?

क्या है स्विफ्ट बैंकिंग प्रणाली

स्विफ्ट यानी सोसाइटी फॉर वर्ल्डवाइड इंटरबैंक फाइनेंशियल टेलीकम्युनिकेशन एक मैसेजिंग नेटवर्क है, जिसकी मदद से इंटरनेशनल ट्रांजैक्शन को अंजाम दिया जाता है। आज दुनियाभर में 11 हजार से भी ज्यादा बैंक और संस्थान स्विफ्ट बैंकिंग प्रणाली से जुड़े हुए हैं। यही एक बड़ी वजह है, जिसके चलते इसे ग्लोबल ट्रांजैक्शन का व्हाट्सएप कहा जाता है। स्विफ्ट बैंकिंग प्रणाली ही ग्लोबल ट्रांजैक्शन को मैनेज करने का काम करती है। हालांकि, स्विफ्ट सिस्टम को पूरी तरह से अमेरिका और पश्चिमी देशों द्वारा नियंत्रित किया जाता है। रूस द्वारा यूक्रेन के खिलाफ युद्ध शुरू करने के बाद उसे स्विफ्ट सिस्टम से बाहर निकाल दिया गया था। विशेषज्ञों ने इसे रूस के ऊपर एक फाइनेंशियल न्यूक्लियर अटैक बताया था। 

अमेरिका द्वारा रूस के ऊपर किया गया यह फाइनेंशियल हमला भारत के साथ-साथ दुनिया के कई देशों के लिए एक वेक-अप कॉल थी। क्योंकि उस समय जो रूस के साथ हुआ वो कल को भारत के साथ भी हो सकता है। इसी को देखते हुए इस साल कजान में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन में इंटरनेशनल ट्रांजैक्शन और मैसेजिंग नेटवर्क बनाने पर जोर दिया गया। ब्रिक्स अमेरिका द्वारा जो नया हिप्पोक्रेटिक वर्ल्ड ऑर्डर तय किया गया है उसको चुनौति देना चाहता है। 

ब्रिक्स सम्मेलन में डि-डॉलराइजेशन के ट्रेंड को शुरू करने के पक्ष में जो भी बातें हुई हैं अगर वो सफल साबित होती हैं तो आने वाले समय में यह ट्रेंड मिडिल ईस्ट से लेकर कई विकासशील देशों में पहुंचेगा। ब्रिक्स अगर ग्लोबल ट्रांजैक्शन सिस्टम बनाता है और इसमें भारत, मिडिल ईस्ट, अफ्रीका और दूसरे देशों को शामिल करता है तो यह अमेरिका द्वारा तैयार किए गए हिप्पोक्रेटिक फाइनेंशियल सिस्टम के ऊपर करारा तमाचा होगा। इससे डॉलर मोनोपॉली कम होगी। यही नहीं इससे पेट्रो डॉलर सिस्टम के ढांचे को भी चोट पहुंचाई जा सकती है। यह काम आसान नहीं है। इसमें कई तरह की चुनौतियां आएंगी। 

क्या हैं ब्रिक्स की चुनौतियां

ब्रिक्स की सबसे बड़ी समस्या चीन है। आज के समय ब्रिक्स की कुल जीडीपी में एक बड़ी हिस्सेदारी चीन की है। ऐसे में ब्रिक्स जिसके कोर एजेंडे में अमेरिका और पश्चिमी देशों की पक्षपातपूर्ण नीतियों का विरोधा करना है। उस ब्रिक्स में कहीं न कहीं चीन का वर्चस्व आने वाले समय में ब्रिक्स के निर्णयों और उसके द्वारा तैयार की गई नीतियों में चीन के प्रभुत्व को जन्म दे सकता है। आज के समय चीन जरूर भारत की सीमा से पीछे हट रहा है। हालांकि, लंबे समय से दोनों देशों की रिश्ते ठीक नहीं रहे हैं और चीन पर भरोसा करना भारत के लिए किसी भी मायने में ठीक नहीं है। 

ऐसे में ब्रिक्स के दो बड़े देशों का यह आपसी विवाद भविष्य में कई नई समस्याओं को जन्म दे सकता है। इसका फायदा अमेरिका और पश्चिमी देश जरूर उठाने की कोशिश करेंगे। यही नहीं सऊदी अरब और ईरान की दुश्मनी भी जग जाहिर है। इसके अलावा इजिप्ट और इथियोपिया के बीच भी नील नदी के पानी को लेकर विवाद चलता आ रहा है। अगर ब्रिक्स वैश्विक स्तर पर अपना शक्ति प्रदर्शन करना चाहता है तो उसको इन देशों के बीच के इस आंतरिक कलह को सुलझाने की जरूरत है। 

यही नहीं हो सकता है कि ब्रिक्स की मदद से चीन अपने यूआन को ग्लोबल ट्रेड करेंसी के रूप में आगे लाना चाहता हो? अगर कल को ब्रिक्स अपनी इंटरनेशनल करेंसी बनाता है तो उसकी कीमत को तय करने में क्या सभी देशों की मदद ली जाएगी? या उसमें कुछ खास देशों के हितों का ही ध्यान रखा जाएगा। ऐसे कई सवाल हैं जो खड़े हो रहे हैं। इन सबका जवाब भविष्य की गर्त में छिपा है। 

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