डॉलर के खिलाफ बगावत
आज के समय ग्लोबल ट्रेड, इंटरनेशनल ट्रांजैक्शन, ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम में डॉलर की बहुत बड़ी भूमिका है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में ऑयल ट्रेडिंग, से लेकर कई दूसरी चीजों की खरीदारी आप सिर्फ डॉलर से ही कर सकते हैं। इस कारण अपनी फॉरन पॉलिसी को निर्धारित करने में अमेरिका डॉलर का इस्तेमाल एक टूलकिट के रूप में करता है। कोई दूसरा देश अगर अमेरिका द्वारा बनाए गए नियमों के मुताबिक नहीं चलता तो उस पर सैंक्शन्स लगा दिए जाते हैं। ये सैंक्शन्स फाइनेंशियल बॉम्ब होते हैं जो उस देश को आर्थिक स्तर पर बर्बाद करने का काम करते हैं।
आज के समय ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम में डॉलर जिस तरह से एम्बेड है। ऐसे में किसी देश के ऊपर यूएस के सैंक्शन्स लगने के कई विनाशकारी प्रभाव देखने को मिलते हैं। यही नहीं कई बार जब अमेरिका को लगता है कि कोई देश उसकी नीतियों के खिलाफ जा रहा है तो वह उसके इंटरनेशनल डॉलर और एसेट को भी फ्रीज कर देता है और उसी एसेट्स का इस्तेमाल उस देश के खिलाफ करता है।
इसी वजह से लंबे समय से कई देशों को अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में डॉलर के वैकल्पिक करेंसी की तलाश रही है। कजान में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन में डॉलर के वैकल्पिक करेंसी को कैसे इंटरनेशल ट्रेड में समायोजित किया जा सकता है? इस विषय पर गहन रूप से चर्चा की गई। इसके अलावा सम्मेलन में एक कॉमन ब्रिक्स करेंसी के ऊपर भी विचार किया गया। कजान डिक्लेरेशन में ब्रिक्स क्रॉस बॉर्डर पेमेंट सिस्टम की बात की गई जो कि आने वाले समय में स्विफ्ट इंटरनेशनल बैंकिंग सिस्टम का विकल्प बन सकता है। इसे समझने से पहले आइए समझते हैं क्या है स्विफ्ट बैंकिंग प्रणाली?
क्या है स्विफ्ट बैंकिंग प्रणाली
स्विफ्ट यानी सोसाइटी फॉर वर्ल्डवाइड इंटरबैंक फाइनेंशियल टेलीकम्युनिकेशन एक मैसेजिंग नेटवर्क है, जिसकी मदद से इंटरनेशनल ट्रांजैक्शन को अंजाम दिया जाता है। आज दुनियाभर में 11 हजार से भी ज्यादा बैंक और संस्थान स्विफ्ट बैंकिंग प्रणाली से जुड़े हुए हैं। यही एक बड़ी वजह है, जिसके चलते इसे ग्लोबल ट्रांजैक्शन का व्हाट्सएप कहा जाता है। स्विफ्ट बैंकिंग प्रणाली ही ग्लोबल ट्रांजैक्शन को मैनेज करने का काम करती है। हालांकि, स्विफ्ट सिस्टम को पूरी तरह से अमेरिका और पश्चिमी देशों द्वारा नियंत्रित किया जाता है। रूस द्वारा यूक्रेन के खिलाफ युद्ध शुरू करने के बाद उसे स्विफ्ट सिस्टम से बाहर निकाल दिया गया था। विशेषज्ञों ने इसे रूस के ऊपर एक फाइनेंशियल न्यूक्लियर अटैक बताया था।
अमेरिका द्वारा रूस के ऊपर किया गया यह फाइनेंशियल हमला भारत के साथ-साथ दुनिया के कई देशों के लिए एक वेक-अप कॉल थी। क्योंकि उस समय जो रूस के साथ हुआ वो कल को भारत के साथ भी हो सकता है। इसी को देखते हुए इस साल कजान में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन में इंटरनेशनल ट्रांजैक्शन और मैसेजिंग नेटवर्क बनाने पर जोर दिया गया। ब्रिक्स अमेरिका द्वारा जो नया हिप्पोक्रेटिक वर्ल्ड ऑर्डर तय किया गया है उसको चुनौति देना चाहता है।
ब्रिक्स सम्मेलन में डि-डॉलराइजेशन के ट्रेंड को शुरू करने के पक्ष में जो भी बातें हुई हैं अगर वो सफल साबित होती हैं तो आने वाले समय में यह ट्रेंड मिडिल ईस्ट से लेकर कई विकासशील देशों में पहुंचेगा। ब्रिक्स अगर ग्लोबल ट्रांजैक्शन सिस्टम बनाता है और इसमें भारत, मिडिल ईस्ट, अफ्रीका और दूसरे देशों को शामिल करता है तो यह अमेरिका द्वारा तैयार किए गए हिप्पोक्रेटिक फाइनेंशियल सिस्टम के ऊपर करारा तमाचा होगा। इससे डॉलर मोनोपॉली कम होगी। यही नहीं इससे पेट्रो डॉलर सिस्टम के ढांचे को भी चोट पहुंचाई जा सकती है। यह काम आसान नहीं है। इसमें कई तरह की चुनौतियां आएंगी।
क्या हैं ब्रिक्स की चुनौतियां
ब्रिक्स की सबसे बड़ी समस्या चीन है। आज के समय ब्रिक्स की कुल जीडीपी में एक बड़ी हिस्सेदारी चीन की है। ऐसे में ब्रिक्स जिसके कोर एजेंडे में अमेरिका और पश्चिमी देशों की पक्षपातपूर्ण नीतियों का विरोधा करना है। उस ब्रिक्स में कहीं न कहीं चीन का वर्चस्व आने वाले समय में ब्रिक्स के निर्णयों और उसके द्वारा तैयार की गई नीतियों में चीन के प्रभुत्व को जन्म दे सकता है। आज के समय चीन जरूर भारत की सीमा से पीछे हट रहा है। हालांकि, लंबे समय से दोनों देशों की रिश्ते ठीक नहीं रहे हैं और चीन पर भरोसा करना भारत के लिए किसी भी मायने में ठीक नहीं है।
ऐसे में ब्रिक्स के दो बड़े देशों का यह आपसी विवाद भविष्य में कई नई समस्याओं को जन्म दे सकता है। इसका फायदा अमेरिका और पश्चिमी देश जरूर उठाने की कोशिश करेंगे। यही नहीं सऊदी अरब और ईरान की दुश्मनी भी जग जाहिर है। इसके अलावा इजिप्ट और इथियोपिया के बीच भी नील नदी के पानी को लेकर विवाद चलता आ रहा है। अगर ब्रिक्स वैश्विक स्तर पर अपना शक्ति प्रदर्शन करना चाहता है तो उसको इन देशों के बीच के इस आंतरिक कलह को सुलझाने की जरूरत है।
यही नहीं हो सकता है कि ब्रिक्स की मदद से चीन अपने यूआन को ग्लोबल ट्रेड करेंसी के रूप में आगे लाना चाहता हो? अगर कल को ब्रिक्स अपनी इंटरनेशनल करेंसी बनाता है तो उसकी कीमत को तय करने में क्या सभी देशों की मदद ली जाएगी? या उसमें कुछ खास देशों के हितों का ही ध्यान रखा जाएगा। ऐसे कई सवाल हैं जो खड़े हो रहे हैं। इन सबका जवाब भविष्य की गर्त में छिपा है।