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रणथंभौर और गांधी-नेहरू परिवार: ये रिश्ता क्या कहलाता है?

Wed, 31 Dec 2025 01:20 PM IST
विनोद पाठक यूटिलिटी डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

रणथंभौर के साथ गांधी-नेहरू परिवार का औपचारिक परिचय प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में हुआ। वर्ष 1961 में जब ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय भारत की राजकीय यात्रा पर आईं, तब नेहरू उन्हें राजस्थान की वीरता और वैभव दिखाने के लिए जयपुर ले गए थे।
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सोनिया गांधी-राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा-रॉबर्ट वाड्रा। - फोटो : PTI/ANI
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विस्तार
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राजस्थान के सवाई माधोपुर में स्थित रणथंभौर नेशनल पार्क केवल बाघों का संरक्षण केंद्र नहीं है, बल्कि यह भारतीय राजनीति के सबसे शक्तिशाली परिवार गांधी-नेहरू परिवार की तीन पीढ़ियों के निजी और सार्वजनिक जीवन का गवाह रहा है। अरावली और विंध्य की पहाड़ियों के मिलन स्थल पर बसा यह जंगल कभी जयपुर के महाराजाओं का निजी शिकारगाह था, लेकिन आज यह गांधी-नेहरू परिवार का सबसे पसंदीदा प्राइवेट रिट्रीट बन चुका है।

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प्रियंका गांधी मां सोनिया गांधी और भाई राहुल गांधी समेत पूरे परिवार के साथ पुत्र रेहान वाड्रा व अवीवा बेग की सगाई का उत्सव यहां मनाने पहुंची हैं। इस जंगल और इस परिवार के दशकों पुराने जटिल संबंधों की कहानी कूटनीति से शुरू होकर संरक्षण के रास्ते होते हुए विलासिता के विवादों से गुजरी तथा आज एक गहरी भावनात्मक विरासत पर आकर टिकी है।

रणथंभौर के साथ गांधी-नेहरू परिवार का औपचारिक परिचय प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में हुआ। वर्ष 1961 में जब ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय भारत की राजकीय यात्रा पर आईं, तब नेहरू उन्हें राजस्थान की वीरता और वैभव दिखाने के लिए जयपुर ले गए थे।
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उस समय रणथंभौर एक नेशनल पार्क नहीं, बल्कि जयपुर राजघराने की संपत्ति था। नेहरू के लिए रणथंभौर एक कूटनीतिक मंच था। महारानी के सम्मान में वहां एक भव्य टाइगर हंट आयोजित किया गया था।

ऐतिहासिक संस्मरणों के अनुसार नेहरू स्वयं शिकार के विरोधी थे, लेकिन उस समय के अंतरराष्ट्रीय प्रोटोकॉल और शाही परंपराओं के आगे वे मौन रहे। यह वह दौर था, जब रणथंभौर का उपयोग दुनिया के सामने भारत की रॉयल छवि पेश करने के लिए किया जाता था।

रणथंभौर को विनाश से बचाने और उसे आज के वैभवशाली रूप में लाने का श्रेय निर्विवाद रूप से इंदिरा गांधी को जाता है। नेहरू के दौर में जहां यह शिकारगाह था तो इंदिरा गांधी के समय में यह अभयारण्य बना। इंदिरा गांधी का प्रकृति प्रेम सर्वविदित था।

उनके कार्यकाल में वर्ष 1972 में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम आया और वर्ष 1973 में ऐतिहासिक प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत हुई। रणथंभौर के विकास में उनका सबसे बड़ा योगदान टाइगर मैन कैलाश सांखला को पूर्ण समर्थन देना था।

इंदिरा गांधी अक्सर यहां बाघों की स्थिति जानने आती थीं। उन्होंने वर्ष 1980 में इसके कोर एरिया को नेशनल पार्क घोषित किया। उनके लिए रणथंभौर पिकनिक का स्थान नहीं, अपितु एक इकोलॉजी मिशन था। आज जो पर्यटक यहां बाघ देखते हैं, वे अनजाने में इंदिरा गांधी के उस विजन का लाभ उठा रहे हैं, जिसने शिकार पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया था।

हालांकि, गांधी-नेहरू परिवार और रणथंभौर के संबंधों में सबसे काला तथा विवादित अध्याय दिसंबर 1987 में लिखा गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी अपनी पत्नी सोनिया गांधी, बच्चों राहुल व प्रियंका, बॉलीवुड के सुपरस्टार अभिताभ बच्चन के परिवार तथा सोनिया गांधी के इतालवी रिश्तेदारों के साथ यहां नया साल मनाने पहुंचे थे।

यह यात्रा भारतीय राजनीति में विपक्षी प्रहार का सबसे बड़ा हथियार बनी। वरिष्ठ पत्रकार तवलीन सिंह ने अपनी पुस्तक दरबार में इस यात्रा का आंखों देखा हाल लिखा। उन्होंने लिखा कि उस समय राजस्थान भीषण सूखे और अकाल से जूझ रहा था। गांव-गांव में पशु मर रहे थे और जनता त्रस्त थी, लेकिन राज्य का पूरा प्रशासनिक तंत्र जोगी महल में प्रधानमंत्री की मेहमाननवाजी में लगा था।

तब सोनिया गांधी के इतालवी रिश्तेदारों की उपस्थिति ने विपक्ष को यह कहने का मौका दिया था कि देश की सुरक्षा और संवेदनशील जंगलों के साथ विदेशी प्रभाव के कारण समझौता किया जा रहा है। आरोप लगे कि प्रधानमंत्री के मित्रों और परिवार के लिए भारतीय वायुसेना के हेलीकॉप्टरों और सरकारी वाहनों का बेजा इस्तेमाल हुआ।

रणथंभौर के ऐतिहासिक जोगी महल को आम जनता और पर्यटकों के लिए पूरी तरह बंद कर दिया गया था। तब पत्रकारों ने इसे लोकतंत्र में राजशाही का उदय करार दिया। उस समय बोफोर्स कांड की आहट सुनाई दे रही थी और अमिताभ बच्चन की राजीव गांधी के साथ इस पिकनिक में मौजूदगी ने क्रोनी कैपिटलिज्म के नैरेटिव को और हवा दी।

इसी दौर में राजीव गांधी की लक्षद्वीप यात्रा और आईएनएस विराट के उपयोग का मामला भी उछला था। इन दोनों घटनाओं, रणथंभौर और लक्षद्वीप, ने मिलकर राजीव गांधी की छवि एक मॉर्डन रिफॉर्मर से बदलकर एक ऐसे नेता की कर दी जो जनता की पीड़ा से कटा हुआ था। 

वैसे, राजीव गांधी की उस विवादित यात्रा के दौरान प्रियंका गांधी एक किशोरी थीं। जहां दुनिया के लिए वह एक विवादित पिकनिक थी, वहीं प्रियंका गांधी के लिए वह अपने पिता के साथ बिताए गए अंतिम सुखद पलों में से एक था। देखा जाए तो प्रियंका गांधी का रणथंभौर के प्रति बार-बार खिंचाव एक इमोशनल रिट्रीट है।

बकौल प्रियंका, उनके लिए रणथंभौर का हर मोड़ और हर बाघिन की दहाड़ उनके पिता की याद दिलाती है। उन्होंने अक्सर साक्षात्कारों में कहा है कि प्रकृति उन्हें हीलिंग का अहसास देती है।

वे रणथंभौर में एक सामान्य पर्यटक की तरह नहीं, बल्कि एक वन्यजीव विशेषज्ञ की तरह समय बिताती हैं। उन्हें रणथंभौर की मशहूर बाघिनों के वंश के विषय में पूरी जानकारी है। दिल्ली की सत्ता और राजनीति के शोर से दूर, रणथंभौर का जंगल उन्हें वह एकांत प्रदान करता है, जहां वे केवल 'प्रियंका' हो सकती हैं, 'गांधी' नहीं।

अब रणथंभौर के एक निजी और सुरक्षित परिवेश में प्रियंका के पुत्र रेहान वाड्रा और अवीवा बेग की सगाई का आयोजन हो रहा है। रेहान की सगाई के लिए इस स्थान को चुनना यह दर्शाता है कि गांधी-नेहरू परिवार की नई पीढ़ी भी अपने पूर्वजों की उस जंगली विरासत को सहेज कर रखना चाहती है। 

हालांकि, रणथंभौर और गांधी-नेहरू परिवार का रिश्ता केवल छुट्टियों का रिश्ता नहीं है। यह भारत के एक सबसे शक्तिशाली परिवार के उतार-चढ़ाव, उनकी व्यक्तिगत रुचियों और उनके राजनीतिक जीवन की संवेदनशीलता का एक जीवंत दस्तावेज है।

बाघों की दहाड़ के बीच, इस परिवार ने यहां शांति भी पाई है और विवादों के तूफान भी झेले हैं। निश्चित रूप से वर्ष 2025 के अंतिम दिन की यह सगाई इसी लंबी और जटिल कहानी का एक नया और सुखद अध्याय है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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