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मप्र: निकाय चुनाव: नतीजों ने तोड़े कई भ्रम, कांग्रेस और भाजपा दोनों को सोचना होगा

सार

मप्र के नगरीय निकाय चुनावों में भाजपा का पलड़ा ही भारी रहा है। उसने राज्य के कुल 347 नगरीय निकायों में से 256 पर जीत हासिल की है। नगर परिषदों में 255 में से 190 पर भाजपा का कब्जा है। यह पिछली बार से 43 ज्यादा है। लेकिन बावजूद इन परिणामों के भाजपा के  लिए एक चिंता की रेखा भी समानांतर चल रही है। 
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कुल मिलाकर नगरीय निकाय चुनावों में भाजपा का पलड़ा ही भारी रहा है। उसने राज्य के कुल 347 नगरीय निकायों में से 256 पर जीत हासिल की है। - फोटो : Amar Ujala Digital
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विस्तार
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मध्यप्रदेश में हाल में सम्पन्न नगरीय निकाय और पंचायत चुनावों को राज्य में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों का सेमीफाइनल मानें तो नतीजे सत्तारूढ़ भाजपा के लिए चेतावनी भरे हैं जबकि कांग्रेस कुछ उत्साहित है।

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राज्य के 16 नगर निगमों से 7 भाजपा ने इस चुनाव में गंवा दिए हैं तो हाशिए पर समझी जाने वाली कांग्रेस ने ग्वालियर जबलपुर जैसे बड़े नगर निगमों सहित कुल 5 नगर निगमों पर कब्जा कर भाजपा के आला नेताओं को तगड़ा झटका दिया है।
 

कुल मिलाकर नगरीय निकाय चुनावों में भाजपा का पलड़ा ही भारी रहा है। उसने राज्य के कुल 347 नगरीय निकायों में से 256 पर जीत हासिल की है। नगर परिषदों में 255 में से 190 पर भाजपा का कब्जा है। यह पिछली बार से 43 ज्यादा है।

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दरअसल, यह आंकड़ा इतना बड़ा होने की एक वजह 29 नई नगर परिषदें जुड़ना भी है। जबकि कांग्रेस नगर परिषदों में 60 से घटकर 35 पर आ गई हैं। निर्दलीय और तीसरे मोर्चे का बहुमत 30 सीटों पर दिखा है, जो कि पहले की तुलना में घटा है। पिछले चुनाव में यह 45 था।


क्या इशारा कर रहे हैं चुनाव परिणाम? 

इस चुनाव में मप्र के बदलते राजनीतिक परिदृश्य के भी स्पष्ट संकेत दिए हैं। मप्र की राजनीति अभी तक मोटे तौर पर दो ध्रुवीय यानी भाजपा और कांग्रेस के बीच ही बंटी रही है। इसमे कुछ हिस्सेदारी बसपा, सपा और गोंगपा आदि की रही है। लेकिन अब इन पार्टियों का वोट भी आम आदमी पार्टी और एआईएमआईएम की तरफ शिफ्ट होने लगा है।

‘आप’ की तो मप्र में धमाकेदार एंट्री हुई है। सिंगरौली नगर निगम में उसकी महापौर प्रत्याशी रानी अग्रवाल चुनाव जीत गई हैं तो कटनी में बागी निर्दलीय प्रीति सूरी महापौर बनी हैं।
 

नतीजो का अगर अंचलवार विश्लेषण करें तो  महाकोशल अंचल में अब भाजपा का एक भी महापौर नहीं है। यही स्थिति ग्वालियर चंबल अंचल में भी है। वहां भाजपा से कांग्रेस ने ग्वालियर और मुरैना दोनो नगर निगम छीन लिए हैं। बघेलखंड में भी भाजपा 3 में से एक नगर निगम ही जीत पाई।


इस अंचल के रीवा में कांग्रेस और सिंगरौली में आप की प्रत्याशी ने जीत कर परचम लहराया। अलबत्ता मालवा, निमाड़ और बुंदेलखंड में भाजपा की स्थिति बेहतर रही है। इसका एक कारण चुनाव के वक्त ही उदयपुर में मुस्लिम कट्टरपंथियों द्वारा एक हिंदू दर्जी की नूपुर शर्मा का समर्थन किए जाने पर निर्मम हत्या की घटना भी था, जिसने परोक्ष रूप से मतों का तेजी से धार्मिक ध्रुवीकरण कर दिया।

दरअसल, अगर सफलता का प्रतिशत देखें तो इन चुनावों में भाजपा की सफलता की दर 74 और कांग्रेस की 18 फीसदी ही रही। इस बार बड़ी संख्या में निर्दलीय भी जीते हैं, जिनकी परिषद बनाने में निर्णायक भूमिका हो सकती है।  

भाजपा में अंदरूनी चर्चा यह है कि सिंधिया को दलबदल के मुआवजे के रूप में जो दिया जाना था, दिया जा चुका है। - फोटो : अमर उजाला
यूं कहने को भाजपा इस जीत का जश्न मना रही है, लेकिन भीतर ही भीतर यह खुटका बढ़ा है कि अगर हालात नहीं सुधरे तो डेढ़ साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में 2018 जैसी तस्वीर फिर बन सकती है, जब भाजपा महज 6 सीटों के अंतर से सत्ता से दूर रह गई थी।

हालांकि पार्टी की कोशिश है कि नगरीय क्षेत्रों में कम होते जन समर्थन की भरपाई वो आदिवासी क्षेत्रों से करे। पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति के रूप में द्रौपदी मुर्मू का चुना जाना भी इसी दूरगामी रणनीति का हिस्सा है, क्योंकि मप्र में देश में सर्वाधिक आदिवासी आबादी है और विधानसभा की 47 सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं। बीजेपी अगर इनमें से आधी भी जीतने में कामयाब हो जाती है तो सत्ता का गणित उसके पक्ष में हो सकता है।

लेकिन ये तो आगे की बात है। फिलहाल नतीजों से कुछ बाते साफ उभर रही हैं। पहला तो भाजपा के कई दिग्गज नेताओं का भविष्य दांव पर है।

सबसे बड़ा झटका तो उन ज्योतिरादित्य सिंधिया को लगा है, जो ग्वालियर चंबल को अपना राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र मानते हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने इस अंचल की कुल 34 सीटो में से 26 पर जीत हासिल की थी, जिसकी वजह सिंधिया इस क्षेत्र में अपना असर मानते थे।


ग्वालियर-चंबल अंचल के नतीजे और भाजपा

इसी आधार पर उन्होंने कांग्रेस में ज्यादा दायित्व की अपेक्षा की थी और वो न मिलने पर अपने समर्थकों के साथ भाजपा में शामिल गए थे। इस दलबदल के बाद राज्य में कांग्रेस की कमलनाथ सरकार गिर गई थी। सिंधिया के भाजपा  में जाने से माना जा रहा था कि वहां कांग्रेस अब हाशिए पर है। लेकिन नगरीय निकाय चुनावों ने खुद सिंधिया और राजनीतिक प्रेक्षकों का भ्रम भी तोड़ दिया है। वहां ग्वालियर और मुरैना नगर निगमों पर कांग्रेस ने दमदार जीत हासिल कर ली है। क्योंकि इन दो नगर निगमों में विधानसभा की 12 सीटें आती हैं।

ग्वालियर-चंबल अंचल में हार का झटका अकेले सिंधिया को ही नहीं, भाजपा के उन दिग्गज नेताओं को भी है, जो राज्य में भावी मुख्यमंत्री पद के दावेदार भी हैं। यह क्षेत्र केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर का भी है, प्रदेश के गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वी.डी.शर्मा का भी है। इनके अलावा वर्तमान शिवराज मंत्रिमंडल में 9 मंत्री और 14 मंत्री दर्जा प्राप्त नेता भी इसी अंचल से आते हैं।

वैसे नगरीय निकाय चुनावों में कांग्रेस को मिली सफलता इतनी बड़ी भी नहीं है कि वह अगले विधानसभा चुनाव में जीत का सपना देख सके। हालांकि कांग्रेस कार्यकर्ता इस जीत का श्रेय प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ की रणनीति को दे रहे हैं। अलबत्ता इन नतीजों ने यह तो साबित किया है कि कांग्रेस मुकाबले में बनी हुई है।

दरअसल कांग्रेस को मिली कामयाबी के पीछे पार्टी के जुझारूपन से ज्यादा सत्तारूढ़ भाजपा में चला आंतरिक घमासान ज्यादा है। टिकट वितरण और बूथ मैनेजमेंट को लेकर पार्टी में जबर्दस्त खींचतान चली।
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कांग्रेस को मिली कामयाबी के पीछे पार्टी के जुझारूपन से ज्यादा सत्तारूढ़ भाजपा में चला आंतरिक घमासान ज्यादा है। - फोटो : अमर उजाला
यह संघर्ष शीर्ष स्तर से लेकर निचले स्तर पर दिखाई दिया। भाजपाई यह माने बैठे हैं कि मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह चौहान की यह आखिरी पारी है और अगले मुख्यमंत्री के लिए कई प्रतिद्वंदी आकांक्षी नेता अपनी गोटी फिट करने की जुगत में हैं। अधिकांश ऐसे नेता ग्वालियर-चंबल अंचल से ही आते हैं। यह बात अलग है कि भाजपा में आला कमान कोई भी चौंकाने वाला निर्णय ले सकता है।  

इन चुनाव नतीजों का विपरीत असर ज्योतिरादित्य सिंधिया की राजनीतिक सौदेबाजी की क्षमता पर हो सकता है। नगरीय निकाय चुनाव के टिकट वितरण में भाजपा संगठन ने उनकी लगभग अनदेखी की। ऐसे में विधानसभा चुनाव में हालात इससे भी बदतर हो सकते हैं।

भाजपा में अंदरूनी चर्चा यह है कि सिंधिया को दलबदल के मुआवजे के रूप में जो दिया जाना था, दिया जा चुका है। और ज्यादा की उम्मीद न करें। उधर सिंधिया के कई समर्थक भी सीधे संघ से अपने तार जोड़ने में लगे हैं। नई परिस्थिति में भाजपा में महल विरोधी राजनीति करने वालों के दिन फिर सकते हैं। उधर सिंधिया की मुश्किल यह है कि लौटकर कांग्रेस में जाना भी मुनासिब नहीं है।  


कांग्रेस की स्थिति और भविष्य? 

इन चुनाव परिणामों में कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी यह है कि असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम कांग्रेस के परंपरागत अल्पसंख्यक वोटों में सेंध लगा रही है। उसके 6 पार्षद जीते हैं, जिनमे एक हिंदू महिला पार्षद भी है। एआईएमआईएम ने ज्यादातर कांग्रेस के वोट ही काटे हैं।

इसी तरह आम आदमी पार्टी की 1 महापौर तथा 64 पार्षद चुनाव में विजयी हुए है। आप सीधे भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगा रही है। हालांकि एक और विपक्षी पार्टी बसपा के 54 पार्षद जीते हैं, लेकिन समाजवादी पार्टी का एक भी पार्षद नहीं जीता।

यह इस बात का संकेत है कि मप्र में विपक्षी वोटो का भी शिफ्ट हो रहा है। बसपा, सपा और गोंगपा जैसी विपक्षी पार्टियों की जगह अब नई पार्टियां आप और एआईएमआईएम लेती जा रही हैं। इन चुनावों में निर्दलीयो ने खूब दम दिखाया। निकाय चुनावों में कुल 988 निर्दलीय पार्षद जीते हैं, इनमें से अधिकांश भाजपा और कांग्रेस के बागी हैं, जिन्हें पार्टी ने टिकट नहीं दिया तो वो निर्दलीय खड़े हो गए।

इन नतीजों में कई रोचक बातें भी सामने आईं। मसलन कांग्रेस ने अपने तीन वर्तमान विधायकों को महापौर प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ाया था और तीनो ही हार गए। इसी तरह भोपाल में दोनो पार्टियों की महापौर प्रत्याशी भाजपा की मालती राय और कांग्रेस की विभा पटेल अपने ही वार्ड में चुनाव हार गईं।

हालांकि अंतिम विजय मालती राय की हुई। जिन नगर निगमो में गैर भाजपा प्रत्याशी जीते हैं, वहां रीवा और छिंदवाड़ा को छोड़कर परिषद भाजपा की बनेगी। क्योंकि ज्यादा पार्षद भाजपा के जीते हैं। ऐसे में महापौर और परिषद के बीच निरंतर टकराव होना तय है। 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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