आज जब देश की कुल साक्षरता दर 73 प्रतिशत है (जो अभी भी बहुत कम है) आदिवासियों की साक्षरता दर केवल 59 प्रतिशत ही है।
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आदिवासी समुदाय शुरुआत से ही मुख्य आबादी से अलग-थलग रहा है, लेकिन अब जब यह समाज मुख्यधारा में आना चाहता है तो इसे अनगिनत बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है जिसे समझने की जरूरत है। इनके गांव में न तो सड़कें हैं, न यातायात की सुविधा।
ग़रीबी और भूखमरी इस हद तक है कि ये अपने बच्चों को स्कूल भेजने की जगह मजदूरी करवाने के लिए मजबूर हैं, वो काम भी नियमित रूप से नहीं मिलता। कर्ज बढ़ता जाता है और आमदनी का कोई स्थाई जरिया नहीं।
दूसरी ओर आदिवासियों की समृद्ध संस्कृति भी क्षीण होती जा रही है। पलायन, अन्य जातियों से जुड़ाव और तकनीकी विकास ने आदवासी युवाओं में अपनी संस्कृति के प्रति उदासीनता भर दी है जिससे उनकी अपनी पहचान खत्म हो रही है। उनकी कला को फिर से समृद्ध करने की जरूरत है, जो देश की धरोहर है। आदिवासियों ने जिस तरह से प्रकृति से प्रेम किया है उससे हर किसी को सीख लेने की जरूरत है।
आज जब देश की कुल साक्षरता दर 73 प्रतिशत है (जो अभी भी बहुत कम है) आदिवासियों की साक्षरता दर केवल 59 प्रतिशत ही है। उसमें भी जब महिलाओं की बात आती है तो आदिवासी पुरुषों के 69 प्रतिशत साक्षरता दर के मुकाबले आदिवासी महिलाओं की साक्षरता दर केवल 49 प्रतिशत ही है। जैसे-जैसे उच्च शिक्षा की ओर बढ़ते हैं यह अंतर बढ़ता ही जाता है।
आदिवासी समुदाय का पिछड़ापन
जागरूकता का अभाव और साथ में शिक्षण संस्थाओं की कमी के कारण यह समाज आज तक पिछड़ा हुआ है। कृषि कार्य हो या फिर मजदूरी का काम यहां महिलाओं की भागीदारी पुरुषों से हमेशा से अधिक रही है लेकिन उनके पास कोई अधिकार नहीं हैं। आदिवासी गांवों में स्वास्थ्य व्यवस्था और गंदगी एक चिंता का विषय रहा है। यहां साफ़-सफाई के प्रति जागरूकता की कमी के कारण कई बीमारियां फैलती रहती है। इलाज़ के लिए लोग झाड-फूंक, झोलाछाप डॉक्टर या जड़ी-बूटियों पर निर्भर रहते हैं।
सरकारी अस्पताल की लचर व्यवस्था से इलाज़ सही से नहीं हो पाता और प्राइवेट डॉक्टर तथा अस्पताल का खर्च वहन करना इनके लिए नामुमकिन जैसा है। इस मामले में भी महिलाओं की स्थिति काफी खराब है। सरकार प्रयासों के बावजूद आज भी प्रसव के लिए ये लोग अस्पताल जाने से परहेज ही करते हैं।
NFHS की रिपोर्ट्स के अनुसार भारत में शिशु मृत्यु दर करीब 44 प्रतिशत और पांच वर्ष के बच्चों की मृत्यु दर 57 प्रतिशत है। कई आदिवासी समुदाय आज भी गर्वनिरोधक के लिए जड़ी-बूटी अथवा घरेलू उपायों पर भरोसा करते हैं, जो कई बार कारगर नहीं होता। कुल मिलाकर प्रजनन पूर्व तथा पश्चात् इन्हें कई परेशानियों से जूझना पड़ता है। महिलाओं में एनीमिया की समस्या आम है।
राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू के बहाने ही सही आदिवासी समुदाय चर्चा में है। हमारे नीति नियंताओं को आदिवासी समुदाय के बारे में नए सिरे से सोचने की आवश्यकता है। कई राष्ट्रपति अपने कार्यकाल के दौरान चर्चित रहे हैं, कुछ ऐसी ही उम्मीद महिलाओं और आदिवासी समुदाय में खासतौर से आदिवासी समुदाय में द्रौपदी मुर्मू से जगी है।
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