डोनोघ का मामला इंग्लैंड की सर्वोच्च अदालत में गया। इंग्लैंड की संसद के उच्च सदन को हाउस ऑफ लार्ड्स कहते हैं, जिसे मोटे तौर पर आप वहां की राज्य सभा मान सकते हैं। हाउस ऑफ लार्ड्स इंग्लैंड के सर्वोच्च न्यायालय का भी काम करता है। जब कि हमारे देश में राज्यसभा शुद्ध रूप से विधायिका का हिस्सा है। लोकसभा के साथ मिलकर यह भी कानून बनाने का काम करती है। वहां लार्ड एटकिन की अगुवाई वाली ज्यूरी ने 3-2 के बहुमत से इस केस का फैसला सुनाया था।
'पड़ोसी 'का सिद्धांत, रखना होगा ध्यान
डोनोघ के मामले में लार्ड एटकिन ने पहली बार कानून में 'पड़ोसी' के सिद्धांत की बात कही थी। उनका कहना था कि अपने आसपास के लोगों के प्रति आप का कर्तव्य है कि आपके किसी काम या लापरवाही से उन्हें किसी तरह का नुकसान नहीं होना चाहिए। इस तरह से मामले में पड़ोसी वे लोग माने जाएंगे जिन पर आपके काम या आपकी लापरवाही का असर पड़ता है।
इस मामले में स्थानीय निर्माता जिंजर बियर की कंपनी पड़ोसी की श्रेणी में आएगी। डोनोघ के प्रति उसका कर्तव्य था कि उसके किसी काम या लापरवाही से उनको किसी तरह का नुकसान न हो। बोतल में मिले मरे घोंघे से साबित होता है कि निर्माता ने अपने कर्तव्य का पालन न करते हुए मामले में लापरवाही बरती थी। लिहाजा निर्माता कंपनी को पीड़िता डोनोघ को हर्जाना देना ही होगा।
ऐसे में आप यह भी जान लें कि ऐसे मामले लॉ ऑफ टार्ट्स (हिंदी में अपकृत्य विधि) के अधीन आते हैं। इनमें कोई लिखित कानून नहीं है। पुराने मामलों में दिए गए फैसलों के आधार पर नए मामले निपटाए जाते हैं। भारत में लॉ ऑफ टार्ट्स का ज्यादातर हिस्सा इंग्लैंड के कॉमन लॉ के अनुरूप ही है। यहां की अदालतें इंग्लैंड की अदालतों द्वारा सुनाए फैसले के अनुसार ही अपने फैसले देती हैं।
अगली कड़ी में एक और रोचक मुकदमे की जानकारी के साथ हम फिर हाजिर होंगे। तब तक के लिए बॉय-बॉय...